2 लाख श्रीफलों से 700 मुनिराजों को महाअर्घ्य, रक्षासूत्र में बंधा श्रमण संस्कृति की रक्षा का संकल्प

धर्म

2 लाख श्रीफलों से 700 मुनिराजों को महाअर्घ्य, रक्षासूत्र में बंधा श्रमण संस्कृति की रक्षा का संकल्प

 

दलाल बाग में रक्षाबंधन का दिखा अनूठा स्वरूप: हजारों श्रद्धालुओं ने बांधा वात्सल्य सूत्र, मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा—“हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं, कुछ लड़ाइयों से दूर रहना ही सबसे बड़ी जीत”

 

इंदौर।

कहीं केसरिया साड़ियों में सजी मातृशक्ति, कहीं सफेद परिधानों में श्रद्धालुओं की कतार और सामने करीब 2 लाख श्रीफलों से सजा महाअर्घ्य का विशाल स्वरूप… शुक्रवार सुबह वीआईपी रोड स्थित दलाल बाग का दृश्य सामान्य रक्षाबंधन से बिल्कुल अलग नजर आया। यहां राखी की डोर केवल भाई-बहन के रिश्ते को नहीं, बल्कि धर्म, साधु-संतों और श्रमण संस्कृति की रक्षा के संकल्प को मजबूत कर रही थी।

 

निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर महाराज के सान्निध्य में श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस एवं वात्सल्य दिवस का भव्य आयोजन हुआ। हजारों श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को रक्षासूत्र और वात्सल्य सूत्र बांधकर प्रेम, सौहार्द और सामाजिक एकजुटता का संदेश दिया। वहीं आचार्य अकंपनाचार्य सहित 700 मुनिराजों पर आए उपसर्ग की स्मृति में करीब 2 लाख श्रीफलों से महाअर्घ्य समर्पित किया गया। श्रमण संस्कृति के जयघोष से पूरा दलाल बाग गूंज उठा।

 

सुबह से उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

 

आयोजन में शामिल होने के लिए श्रद्धालु सुबह 6 बजे से ही दलाल बाग पहुंचने लगे थे। अभिषेक, शांतिधारा और पाद प्रक्षालन के बाद रक्षाबंधन पूजन एवं मुनिराज आराधना संपन्न हुई। इसके बाद सामूहिक रक्षाबंधन और वात्सल्य सूत्र बांधने का क्रम शुरू हुआ।

 

हजारों समाजबंधुओं ने एक-दूसरे को सूत्र बांधते हुए यह संदेश दिया कि वास्तविक रक्षा केवल शरीर की नहीं, बल्कि संस्कारों, धर्म और संस्कृति की भी होनी चाहिए।

 

700 मुनिराजों के उपसर्ग की सुनाई प्रेरक गाथा

 

धर्मसभा में मुनिश्री सुधासागर महाराज ने रक्षाबंधन की जैन परंपरा और आचार्य अकंपनाचार्य सहित 700 मुनिराजों पर आए उपसर्ग का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन का पर्व केवल पारिवारिक स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म और श्रमण संस्कृति की रक्षा के संकल्प को जागृत करने वाला पर्व है।

 

मुनिश्री ने कहा कि धर्म की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संयम, त्याग, संस्कार और अपने आचरण से होती है। साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और उनके बताए मार्ग पर चलना ही श्रमण संस्कृति को आगे बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

 

“Ego Point और Prestige Point रिश्तों में दरार डालते हैं”

 

मुनिश्री ने परिवार और समाज में बढ़ते अहंकार और प्रतिष्ठा के भाव पर भी गंभीर संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में “Ego Point” और “Prestige Point” नहीं बनाना चाहिए। व्यक्ति जब हर बात को अपने अहंकार और प्रतिष्ठा से जोड़ने लगता है, तब रिश्तों में दूरी पैदा होती है।

 

उन्होंने कहा—

 

“हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं, कई लड़ाइयों से दूर रहना ही सबसे बड़ी जीत है। दुष्टता का उत्तर दुष्टता से नहीं, संयम और विवेक से देना चाहिए।”

 

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि परिवार और समाज में प्रेम बनाए रखने के लिए अहंकार को पीछे और वात्सल्य को आगे रखना होगा। कई बार विवाद को बढ़ाने के बजाय वहीं रोक देना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।

 

राखी की डोर ने दिया एकता का संदेश

 

दलाल बाग में हुआ यह आयोजन रक्षाबंधन की परंपरा को एक व्यापक सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश देता नजर आया। एक ओर हजारों हाथों में रक्षासूत्र था तो दूसरी ओर 2 लाख श्रीफलों से 700 मुनिराजों के प्रति श्रद्धा का महाअर्घ्य।

 

यह दृश्य मानो यही संदेश दे रहा था कि रिश्तों की रक्षा वात्सल्य से, समाज की रक्षा एकता से और श्रमण संस्कृति की रक्षा संयम एवं संस्कारों से होती है।

 

रक्षाबंधन के इस भव्य आयोजन ने इंदौर में धर्म, श्रद्धा, वात्सल्य और सामाजिक एकजुटता का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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