रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, धर्म और संस्कृति की रक्षा का संकल्प भी : स्वस्तिभूषण माताजी
अकम्पनाचार्य सहित 700 मुनिराजों की रक्षा का प्रसंग सुनाया, बोले—रक्षा सूत्र बांधना देव, शास्त्र और गुरु की रक्षा का संकल्प है
केशवरायपाटन।
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पर्व नहीं है, बल्कि यह धर्म, साधु-संतों और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेने का पावन अवसर भी है। हमें इस पर्व के मूल संदेश को समझते हुए अपने जीवन में प्रेम, क्षमा, वात्सल्य और धर्मरक्षा के भावों को धारण करना चाहिए।
यह उद्गार भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने शुक्रवार को केशवरायपाटन अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने श्रद्धालुओं को रक्षाबंधन से जुड़े जैन धर्म के ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया।

700 मुनिराजों पर आया संकट
माताजी ने बताया कि उज्जयिनी में राजा श्रीवर्मा के शासनकाल में दिगंबर जैन मुनि अकम्पनाचार्य 700 मुनिराजों के साथ पहुंचे थे। चार मंत्रियों ने मुनिराजों का उपहास किया और बाद में उन्हें कष्ट पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन वनदेवता ने उनके प्रयास को विफल कर दिया।
इसके बाद वे चारों मंत्री हस्तिनापुर पहुंचे और राजा पद्म के यहां मंत्री बन गए। अवसर पाकर उन्होंने सात दिनों के लिए राज्य की सत्ता अपने हाथ में ले ली। इसके बाद अकम्पनाचार्य सहित 700 मुनिराजों के चारों ओर अग्नि जलाकर धुआं कर दिया गया।
संकट में भी नहीं छोड़ी समता
भीषण संकट के बावजूद मुनिराजों ने अपना समताभाव नहीं छोड़ा। उन्होंने आहार-पानी का त्याग कर आत्मचिंतन और साधना जारी रखी। जब इस संकट की जानकारी विष्णुकुमार मुनिराज को मिली तो वे हस्तिनापुर पहुंचे।
माताजी ने प्रसंग सुनाते हुए बताया कि विष्णुकुमार मुनिराज ने वामन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन डग भूमि मांगी और बाद में विराट रूप धारण कर दो डग में समस्त मनुष्यलोक को नाप लिया। देवताओं ने क्षमा और शांति के गीत गाकर उन्हें शांत किया। इसके बाद राजा बलि और मंत्रियों ने मुनिराजों से क्षमा याचना की।
वात्सल्य से हुआ मुनिराजों का सत्कार
पूर्णिमा के दिन श्रावकों ने मुनिराजों का वात्सल्यपूर्वक स्वागत किया और घी सहित खीर का आहार कराया। इससे मुनिराजों के गले की पीड़ा शांत हुई। इसी पावन प्रसंग से प्रेरणा लेकर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा का भाव सामने आया।
स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि रक्षा सूत्र केवल कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं, बल्कि यह देव, शास्त्र और गुरु की रक्षा के साथ-साथ अपने भीतर धर्म और सद्भाव को सुरक्षित रखने का संकल्प है।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन हमें याद दिलाता है कि सच्ची रक्षा केवल शरीर या रिश्तों की नहीं, बल्कि धर्म, संस्कार, संस्कृति और आत्मिक मूल्यों की भी होनी चाहिए। प्रेम, क्षमा, वात्सल्य और धर्मरक्षा ही इस पर्व का वास्तविक संदेश है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312






