श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव का समापनः आचार्यश्री वर्धमान सागर ससंघ सान्निध्य में हुए कार्यक्रम
उदयपुर
श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव का समापनः आचार्यश्री वर्धमान सागर ससंघ सान्निध्य में हो गया।
कार्यक्रम के क्रम में गुरुवार को केवल ज्ञान संस्कार क्रिया संपन्न हुई। वहीं शुक्रवार को अग्निदेव द्वारा संस्कार विधि व मोक्ष कल्याणक पूजा का आयोजन किया गया। विसर्जन कार्यक्रम के साथ ही महामहोत्सव का समापन हुआ।
वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में
महामहोत्सव का विसर्जन हुआ। श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव के अंतिम दिन शुक्रवार को ध्यान व आशीर्वाद सभा, श्री जिनाभिषेक एवं नित्यार्चन, मोक्षकल्याणक दृश्य का आयोजन किया गया। वात्सलय वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में अग्निदेव द्वारा संस्कार विधि, मोक्ष कल्याणक पूजा, हवन, पूर्णाहुति की गई।

जन्म को सार्थक कर, मरण को दीक्षा रुपी लक्ष्मी से से वरण करने का कार्य सौभाग्य शाली जीव कर जीवन को सार्थक करते हैं।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
जैन धर्म की महिमा बहुत है भगवान की आत्मा भी हमारी आत्मा जैसी है उन्होंने भी संसार में परिभ्रमण किया। संसार परिभ्रमण में मिथ्यात्व को नष्ट कर सम्यक दर्शन प्राप्त किया । सम्यक दर्शन से केवल ज्ञान प्राप्त कर जितनी आयु शेष थी, तब तक भगवान भी संसारी रहे। अब मोक्ष कल्याणक के दिन कर्म बंधन से मुक्त होकर भगवान की आत्मा परमात्मा हो गई है।उदयपुर पंच कल्याणक में मोक्ष कल्याणक की महती धर्म सभा में मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। ब्रह्मचारी गजू भैय्या राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया आप आकुलता में रहते हैं इसलिए दुखी हैं । भगवान ने आकुलता से निराकुलता,अशांति से शान्ति, के लिए श्रद्धा गुण प्रकट किया।आचार्य श्री ने बताया कि मन की चंचलता से वाणी में चंचलता आती है ,और वाणी की चंचलता से , काय की चंचलता आती है । मन , वाणी, और काय की चंचलता से कर्मों का आश्रव होता है ।हम आप सभी संसारी है भगवान के बहुत उपकार है।

भारत देश में गुरु की कृपा रही हे। कहावत है, गुरु गोविंद दोनों खड़े काके लागू पाय ,बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताए। जिसके माध्यम से आचार्य श्री ने बताया कि भगवान द्वारा प्रतिपादित जिनवाणी को गणघर के माध्यम से गुरुओं आचार्यों ने शास्त्रों में अंकित किया है । गुरुओं ने मोक्ष मार्ग बतलाया है गुरु परिषह उपसर्ग सहन कर आत्मा को परमात्मा बनाने का पुरुषार्थ करते हैं।

आचार्य श्री के पट्टाचार्य पद प्रदाता चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य श्री अजित सागर जी के 34 वे समाधि वर्ष पर आचार्य श्री ने उनका गुणानुवाद किया। आचार्य श्री ने स्वाध्याय चिंतन का विशेष उल्लेख कर बताया कि आचार्य श्री अजित सागर जी 15 से 18 घंटे प्रति दिन जैन ग्रंथों का स्वाध्याय चिंतन करते थे। गुरु के हम पर बहुत कृपा है,गुरु ने निर्बल कंधों पर अपना पट्टाचार्य पद हमें दिया ,सभी गुरुओं के आशीर्वाद से हम आचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा को चला रहे हैं।
आचार्य श्री ने महत्वपूर्ण सूत्र में बताया कि जन्म को सार्थक कर, मरण को दीक्षा रुपी लक्ष्मी से से वरण करने का कार्य सौभाग्य शाली जीव कर जीवन को सार्थक करते हैं। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने आचार्य श्री अजित सागर जी का गुणानुवाद किया। इसके पूर्व
आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज के सान्निध्य में दीप प्रज्वलन व चित्र अनावरण पुण्यार्जक परिवार द्वारा किया गया। रथावर्तन कर यात्रा निकाली गई वहीं वेदी में भगवान को विराजमान, कलशारोहण, ध्वजा एवं ध्वजारोहण किया गया। वहीं श्रीजी को रथयात्रा के माध्यम से श्री महावीर जिनालय दिगम्बर जैन मंदिर लाया गया। संघ सानिध्य में श्री आदिनाथ,श्री पद्म प्रभु,श्री मुनि सुब्रत नाथ भगवान की 61 इंच की खडगासन प्रतिमाओं तथा रजत मान स्तंभ में श्री अजितनाथ भगवान की 8 प्रतिमाएं विराजित कर सौभाग्य शाली परिवार द्वारा अभिषेक किया गया।दोपहर को विसर्जन के साथ महोत्सव का समापन हुआ। श्री शांतिलाल भोजन,शांति लाल वेलावत एवम् अन्य पदाधिकारियों ने महामहोत्सव के दौरान आवास, भोजन, यातायात, जुलूस व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था, पूजन विधान व कलश वितरण, मंच व्यवस्था आदि समितियों के सराहनीय सहयोग का आभार जताया।
राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सलय भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
