सच्चा जैनी वही, जिसके घर में जैनत्व दिखे; केवल नाम से नहीं, आचरण से पहचान बने : मुनिश्री सुधासागर महाराज
रात्रि भोजन से लेकर बुरी आदतों तक पर मुनिश्री का करारा संदेश—“जैनत्व को घर के संस्कार और जीवन के व्यवहार में उतारिए”
इंदौर।
जैन होना केवल नाम, वेश या धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। जैनत्व की असली पहचान व्यक्ति के आचरण, उसके संस्कार और उसके घर के वातावरण से होती है। यदि जिनवाणी में बताए सिद्धांत हमारे दैनिक जीवन में दिखाई नहीं देते, तो केवल स्वयं को जैन कहने का कोई अर्थ नहीं है।
यह संदेश निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव 108 श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया। उन्होंने जैन परिवारों में धर्म के सिद्धांतों के व्यवहारिक पालन को लेकर समाज को आत्ममंथन का संदेश दिया और कहा कि सच्चा जैनी वही है, जिसके घर में जैनत्व केवल बोला नहीं जाता, बल्कि जिया जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि आज हजारों जैन परिवारों में शायद ही कोई ऐसा घर दिखाई देता हो, जहां जैनत्व के सिद्धांतों का पूर्णतः पालन होता हो। जिस घर का वातावरण जिनवाणी में बताए संस्कारों के अनुरूप हो, जहां परिवार के सदस्य धर्म और संयम को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं तथा रात्रि भोजन का पूर्ण त्याग हो, वही वास्तव में जैन संस्कारों वाला घर कहा जा सकता है।
“जिस घर में रात्रि भोजन हो, वहां लिखवा दो—निशाचर भवन”
रात्रि भोजन के विषय में मुनिश्री ने अपने चिर-परिचित तीखे अंदाज में समाज को झकझोरते हुए कहा कि जो व्यक्ति स्वयं रात्रि भोजन करता है और दूसरों को भी करवाता है, उसे अपने जैनत्व पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने करारा कटाक्ष करते हुए कहा कि जैन होकर भी जिस घर में रात्रि भोजन होता है, उस मकान पर ‘निशाचर भवन’ लिखवा देना चाहिए।
मुनिश्री का यह कथन केवल कटाक्ष नहीं, बल्कि जैन परिवारों को अपने घर के संस्कारों और आचरण का आईना दिखाने वाला संदेश था।
दूसरों के सुख की भावना से दूर होंगे अपने दुख
मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति आज अनेक प्रकार के कष्टों, बीमारियों और परेशानियों से घिरा हुआ है। ऐसे में केवल अपने दुख दूर करने की कामना करने के बजाय भावना ऐसी होनी चाहिए कि “प्रभु! जो कष्ट और बीमारी मुझे है, वह किसी अन्य जीव को न हो। संसार के सभी जीव सुखी रहें।”
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति प्रतिदिन ऐसी भावना भाता है तो उसके भीतर की विशुद्धि बढ़ती है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। दूसरों के सुख की सच्ची कामना, स्वयं के भीतर शांति और करुणा का द्वार खोलती है।
बुरी आदत छोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसका प्रचार न करें
मुनिश्री ने व्यसन और बुरी आदतों को लेकर भी समाज को महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति के अंदर कोई बुरी आदत है तो उसे छोड़ने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन यदि तत्काल उसे छोड़ना संभव नहीं हो रहा है तो कम से कम उसे दूसरों के सामने गौरव या फैशन की तरह प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बुराई को छुपाकर रखो, उसका प्रदर्शन मत करो, क्योंकि हमारी एक आदत देखकर दूसरा व्यक्ति भी उसी रास्ते पर चल सकता है। इस तरह हमारी कमजोरी दूसरों के जीवन में भी पाप का कारण बन सकती है।
“अपनी पाप प्रवृत्ति को कोरोना समझो, दूसरों को संक्रमित मत करो”
मुनिश्री सुधासागर महाराज ने पाप प्रवृत्तियों को लेकर बेहद प्रभावशाली उदाहरण देते हुए कहा कि अपनी बुरी आदत और पाप प्रवृत्ति को कोरोना की तरह समझो।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कोरोना का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल सकता है, उसी प्रकार हमारी बुरी आदतें और गलत प्रवृत्तियां भी दूसरों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए यदि कोई कमजोरी है तो उसे दूसरों के सामने आदर्श बनाकर प्रस्तुत न करें।
जैनत्व घर से शुरू होगा, तभी समाज तक पहुंचेगा
मुनिश्री ने धर्मसभा में उपस्थित समाजजनों से आह्वान किया कि जैनत्व को केवल मंदिर, प्रवचन और धार्मिक आयोजनों तक सीमित न रखें। जैनत्व की पहली पाठशाला हमारा अपना घर है।
घर में भोजन की शुद्धता हो, व्यवहार में अहिंसा हो, वाणी में संयम हो, जीवन में व्यसनमुक्ति हो, बड़ों का सम्मान हो, छोटों में संस्कार हों और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा का भाव हो—तभी जैनत्व की वास्तविक प्रतिष्ठा होगी।
मुनिश्री का संदेश स्पष्ट था—जैन कहलाना आसान है, लेकिन जैनत्व को जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है। जिस दिन जैन परिवारों के घरों में जिनवाणी के सिद्धांत व्यवहार में दिखाई देने लगेंगे, उसी दिन समाज में जैन संस्कारों की वास्तविक शक्ति दिखाई देगी।
रिपोर्ट : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी | 9929747312





