गुरु दर्शन केवल देखने का नहीं, जीवन बदलने का अवसर है : मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज
गुरु के त्याग, तप और संयम को देखकर अपने जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में मोड़ना ही सच्चा गुरु दर्शन
कोटा, 25 अगस्त। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी, कोटा में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज के संघस्थ नवदीक्षित मुनिश्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा के पांचवें दिन अपने प्रथम प्रवचन में गुरु दर्शन के आध्यात्मिक महत्व को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि गुरु का दर्शन केवल नेत्रों से किसी संत को देख लेना नहीं है। गुरु के त्याग, तप, संयम, वैराग्य और आत्मसाधना को देखकर अपने जीवन की दिशा को भी आत्मकल्याण की ओर मोड़ना ही सच्चा गुरु दर्शन है।
गुरु दर्शन संसार से हटाकर आत्मा की ओर ले जाता है
मुनिश्री ने कहा कि संसार में आकर्षणों की कोई कमी नहीं है। मनुष्य का मन निरंतर बाहरी सुख-सुविधाओं और विषय-वासनाओं की ओर आकर्षित होता रहता है। ऐसे में संतों का दर्शन उसे संसार के आकर्षणों से हटाकर आत्मा की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।
गुरु के चरणों में बैठने मात्र से मन की चंचलता शांत होने लगती है और जीवन को सही दिशा मिलने लगती है। गुरु स्वयं कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि शिष्य के भीतर छिपे आत्मस्वरूप को जागृत करने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं।

केवल दर्शन नहीं, गुरु के गुणों का अनुकरण ही सच्ची गुरुभक्ति
मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज ने कहा कि गुरु दर्शन की सार्थकता तभी है, जब दर्शन के साथ श्रद्धा, विनय और अनुकरण भी जुड़ जाए। गुरु को देख लेना दर्शन है, लेकिन गुरु के गुणों को अपने जीवन में उतार लेना ही सच्ची गुरुभक्ति है।
गुरु का प्रत्येक क्षण त्याग, संयम, अहिंसा, वैराग्य और आत्मसाधना की प्रेरणा देता है। इसलिए गुरु दर्शन को केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का अवसर समझना चाहिए।
गुरु का सान्निध्य मिलना पुण्य के उदय का प्रतीक
भावपूर्ण संदेश देते हुए मुनिश्री ने कहा कि जिस जीवन को गुरु का सान्निध्य और गुरु की वाणी का प्रकाश मिल जाता है, उसकी दिशा बदल जाती है। संतों के दर्शन का अवसर कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण का दुर्लभ पुण्ययोग है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जब भी संतों के दर्शन का अवसर मिले, तो केवल सांसारिक मनोकामनाएं लेकर उनके पास न जाएं, बल्कि यह भावना रखें—
“हे गुरुदेव! आपके त्याग, तप और संयम से प्रेरणा लेकर मेरा जीवन भी धर्म, संयम और आत्मसाधना की दिशा में आगे बढ़े।”
यही गुरु दर्शन की वास्तविक सार्थकता है।
गुरु के चरणों से मिले प्रेरणा, जीवन में खिले आत्मकल्याण का मार्ग
मुनिश्री ने कहा कि गुरु का सच्चा दर्शन वही है, जिसके बाद विचारों में निर्मलता, व्यवहार में विनय, जीवन में संयम और आत्मा में धर्म के प्रति श्रद्धा बढ़े। यदि गुरु दर्शन के बाद जीवन की दिशा आत्मकल्याण की ओर बदलती है, तो वही दर्शन वास्तव में सार्थक है।
उन्होंने कहा कि गुरु के चरणों में जाकर केवल आशीर्वाद प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। गुरु के आदर्शों को अपने आचरण में उतारना आवश्यक है। गुरु का जीवन स्वयं एक जीवंत संदेश है और उस संदेश को आत्मसात करना ही शिष्य का वास्तविक पुरुषार्थ है।
🌸 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर धर्मलाभ अर्जित किया।
अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री नंदलाल जी, श्रीमती संतोष बाई, श्री अनिल जी, श्रीमती अनीता जी, श्री दर्शन जी, श्रीमती पूजा जी एवं समस्त बरमुंडा परिवार, घाट का बराना वाले, हनुमान नगर द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ, उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती सुजाता पाटिल, श्रीमती गीता कोले एवं समस्त परिवार, महाराष्ट्र द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री शांतिलाल जी एवं श्रीमती शकुंतला जी मित्तल, रामगंजमंडी द्वारा श्रद्धापूर्वक प्राप्त किया गया।
श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवास के रूप में प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री संजय जी, श्रीमती कविता जी, संयम, दिव्यांश एवं समस्त दुगेरिया परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती मधु शाह द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
«“गुरु का दर्शन आंखों से नहीं, आत्मा से कीजिए।
गुरु के त्याग को देखकर जीवन में संयम उतारिए।
गुरु के चरणों में श्रद्धा रखिए
और गुरु के आदर्शों को आचरण में उतारकर
अपने जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में ले जाइए।”»
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312





