धर्म, कर्तव्य और परिवार में संतुलन से बनेगा जीवन सार्थक : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज


मधुबन (गिरिडीह)। जीवन को सार्थक बनाने के लिए केवल धर्म का पालन ही पर्याप्त नहीं, बल्कि धर्म, परिवार, समाज और कर्तव्य—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करना भी जरूरी है। व्यक्ति यदि विवेक, पुरुषार्थ और सही दृष्टिकोण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करे तो उसका जीवन न केवल सफल, बल्कि सार्थक भी बन सकता है।
मधुबन में प्रतिदिन आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में श्रद्धालुओं के धर्म, परिवार, सामाजिक एवं प्रशासनिक दायित्वों से जुड़े सवालों का समाधान करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि “धर्म और व्यवहारिक जीवन में संतुलन स्थापित करने के लिए विवेक, पुरुषार्थ और सही दृष्टिकोण आवश्यक है।”
उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण और सम्यग्दर्शन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति को केवल भवितव्यता के भरोसे निष्क्रिय नहीं बैठना चाहिए। जो साधन और अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध हैं, उनका सदुपयोग करते हुए निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए।
अंतरंग और बहिरंग दोनों निमित्त महत्वपूर्ण
मुनि श्री ने कहा कि किसी भी कार्य की सिद्धि में अंतरंग और बहिरंग दोनों प्रकार के निमित्तों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तत्त्वचिंतन, धर्मश्रवण, जिनवाणी तथा देव-गुरु-धर्म का आश्रय बहिरंग निमित्त हैं, जबकि जीव के अंतरंग परिणाम और कर्मों की स्थिति आध्यात्मिक उपलब्धि के मार्ग को प्रभावित करती है।
गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के सान्निध्य में प्रतिदिन शाम 6 बजे शंका समाधान कार्यक्रम आयोजित हो रहा है। इसमें श्रद्धालु धर्म, परिवार, जीवन, प्रशासनिक दायित्व, व्यवहार और आत्मकल्याण से जुड़े प्रश्नों का समाधान प्राप्त कर रहे हैं।
कर्तव्य का ईमानदारी से पालन भी धर्म
एक आईएएस अधिकारी के प्रश्न का उत्तर देते हुए मुनि श्री ने कहा कि कर्तव्यानुपालन भी व्यक्ति का धर्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश, काल और परिस्थिति के अनुसार धर्म का व्यवहारिक स्वरूप अलग हो सकता है। एक सामान्य गृहस्थ, प्रशासनिक अधिकारी और शासन से जुड़े व्यक्ति के कर्तव्य अलग-अलग होते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपने धार्मिक मूल्यों के साथ व्यावसायिक एवं प्रशासनिक दायित्वों का भी पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रशासनिक निर्णय लेते समय विवेक का उपयोग होना चाहिए और जहां तक संभव हो, अहिंसक एवं लोकहितकारी विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कठोरता कर्तव्य का हिस्सा हो सकती है, लेकिन व्यक्तिगत पूर्वाग्रह अथवा दुर्भावना से किया गया व्यवहार उचित नहीं है।
मुनि श्री ने कहा कि अधिकारी को निष्पक्ष रहकर जनता और समाज के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए कार्य करना चाहिए। उन्होंने सारगर्भित संदेश देते हुए कहा—
“समाज के लिए कानून है, कानून के लिए समाज नहीं है।”
भावनायोग से मन को बनाएं दृढ़
शंका समाधान में एक श्रद्धालु महिला ने भावनायोग से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि एमआरआई जांच के दौरान उन्हें अत्यधिक घबराहट हो रही थी और वे कई बार मशीन के अंदर जाकर वापस बाहर आ गईं। इसके बाद उन्होंने आंखें बंद कर भावनायोग का अभ्यास किया, मन को दृढ़ किया और ऊर्जा प्रवाह का चिंतन करते हुए स्वयं को एकाग्र किया। इसके बाद उनकी जांच सहजता से पूरी हो गई और उन्हें समय बीतने का भी आभास नहीं हुआ।
इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने संयुक्त परिवार में प्रेम और सद्भाव बनाए रखने का प्रश्न किया।
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने संयुक्त परिवार के लिए सरल और प्रभावी सूत्र देते हुए कहा—
“बड़े छोटों का ध्यान रखें और छोटे बड़ों का मान रखें।”
उन्होंने कहा कि परिवार में एक-दूसरे की भावनाओं को समझना, योग्य व्यक्ति का सम्मान करना, आदर-सत्कार और प्रेमपूर्ण व्यवहार पारिवारिक एकता के मजबूत आधार हैं। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करने और परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करने की क्षमता परिवार में प्रेम और सद्भाव बनाए रखती है।
हर मांगलिक अवसर को पुण्य से जोड़ें
कार्यक्रम में एक श्रद्धालु परिवार ने अपनी दो बालिकाओं के संस्कारों से जुड़ा प्रश्न रखा। परिवार ने बताया कि उनकी माता ने गर्भकाल से ही भावनायोग का अभ्यास किया और दोनों बालिकाओं में बचपन से ही धर्म एवं गुरुचरणों के प्रति विशेष आकर्षण दिखाई देता है।
इस पर मुनि श्री ने कहा कि कई बार किसी जीव के विशेष पुण्य और संस्कारों का प्रभाव उसके जीवन में विशेष रूप से दिखाई देता है। पुण्य के कारण अनुकूल निमित्त प्राप्त होते हैं और उनके माध्यम से परिवार के अन्य सदस्यों को भी धर्म एवं पुण्य कार्यों से जुड़ने का अवसर मिलता है।
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा—
“जीवन के हर मांगलिक कार्य को पुण्य के साथ संपन्न करो।”
उन्होंने कहा कि जीवन के शुभ अवसरों को धार्मिक एवं पुण्य कार्यों से जोड़ने से नई पीढ़ी में अच्छे संस्कार विकसित होते हैं और परिवार में धर्म का वातावरण मजबूत होता है।
जानकारी: अविनाश जैन विद्यावाणी
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
संपर्क: 9929747312


