सत्य केवल सच बोलना नहीं, मन-वचन-काय का संयम भी जरूरी : गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

सत्य केवल सच बोलना नहीं, मन-वचन-काय का संयम भी जरूरी : गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

केशवरायपाटन।
अतिशय क्षेत्र केशवरायपाटन में प्रवचन के दौरान भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने सत्य धर्म के व्यापक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्य केवल सच बोलने का नाम नहीं है, बल्कि मन, वचन और काय—तीनों की प्रवृत्तियों को संयमित करना भी सत्य धर्म का महत्वपूर्ण अंग है।

 

 

माताजी ने कहा कि सामान्य रूप से हम सत्य वचन को ही सत्य मान लेते हैं, लेकिन जैन दर्शन में सत्य का स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है। सत्य वचन, सत्य अणुव्रत, सत्य महाव्रत, भाषा समिति और सत्य वचन योग सहित सत्य के विभिन्न स्वरूपों को समझना आवश्यक है।

 

 

उन्होंने कहा कि हित, मित और प्रिय भाषा के अनुरूप बोले गए वचन ही सत्य की सार्थकता को प्रकट करते हैं। केवल तथ्य बोल देना पर्याप्त नहीं, बल्कि हमारी भाषा किसी के लिए अहितकारी या कष्टदायक न हो, इसका भी ध्यान रखना चाहिए। दस धर्मों में सत्य धर्म का विशेष महत्व है और मुनिराज सत्य महाव्रत का पालन करते हुए सत्य धर्म की साधना के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।

माताजी ने कहा कि सत्य महाव्रत की ओर बढ़ने से पहले सत्य अणुव्रत का पालन आवश्यक है। जब गृहस्थ जीवन में सत्य अणुव्रत का पालन ही कठिन हो रहा हो, तब सीधे सत्य महाव्रत की ओर बढ़ना संभव नहीं है। इसलिए पहले सत्य के प्रकार, उसके स्वरूप और लक्षणों को समझना जरूरी है।

 

 

मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों को समझना जरूरी

प्रवचन में माताजी ने योग के 15 प्रकारों की चर्चा करते हुए बताया कि इनमें चार प्रकार के मनोयोग, चार प्रकार के वचनयोग और सात प्रकार के काययोग बताए गए हैं। योग के इन स्वरूपों को समझने से मन, वचन और शरीर की विभिन्न प्रवृत्तियों को समझने में सहायता मिलती है।

उन्होंने कहा कि जब तक मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों को नहीं समझेंगे, तब तक सत्य के वास्तविक स्वरूप और सत्य अणुव्रत के पालन को पूरी तरह समझ पाना कठिन है।

माताजी ने कहा कि सत्य को केवल बोलने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। सत्य के व्यापक स्वरूप को समझते हुए अपने विचारों, वाणी और व्यवहार में संयम लाना चाहिए। मन में शुद्धता, वाणी में मधुरता और कर्मों में संयम—यही सत्य धर्म की वास्तविक साधना है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि सत्य को जीवन का केवल एक नियम न मानकर जीवन की साधना और आचरण का आधार बनाएं। मन, वचन और काय को संयमित करते हुए सत्य धर्म की ओर बढ़ना ही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग है।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312

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