♦संपत्ति से बड़ी है आत्मा की संपदा, पापास्रव का निरोध ही सच्चा पुरुषार्थ : मुनिश्री योगसागर जी महाराज
धन बढ़ाने से अधिक जरूरी है क्रोध, मान, माया, लोभ और आसक्ति को घटाना
कोटा, 24 अगस्त। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में बाहरी संपत्ति बढ़ाने को ही सफलता मानता है, जबकि वास्तविक उपलब्धि आत्मा की निर्मलता और पापास्रव का निरोध है। यदि जीवन में पाप का प्रवाह रुक रहा है, तो यही सबसे बड़ी कमाई है; और यदि पापास्रव लगातार बढ़ रहा है तो संसार की अपार संपत्ति भी आत्मकल्याण के लिए सार्थक नहीं हो सकती।
🪷 धन नहीं, आत्मा की निर्मलता ही सबसे बड़ी संपदा
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य धन, प्रतिष्ठा, पद, परिवार, वैभव और सुख-सुविधाओं को अपनी संपत्ति मानकर उनकी वृद्धि के लिए निरंतर प्रयास करता है, लेकिन आत्मा की निर्मलता को भूल जाता है। बाहरी वैभव क्षणभंगुर है, जबकि आत्मिक संपदा शाश्वत है।

धन-संपत्ति होना बुरा नहीं है, लेकिन यदि उसके साथ अहंकार, लोभ, हिंसा, छल-कपट और विषयासक्ति बढ़ने लगे तो वही संपत्ति आत्मकल्याण में बाधक बन जाती है। इसके विपरीत रत्नत्रय की आराधना, संयम, सदाचार और पाप से निवृत्ति बढ़ रही है तो यही वास्तविक आध्यात्मिक समृद्धि है।
🌿 खुद से पूछें—संपत्ति बढ़ रही है या पाप घट रहे हैं?
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन स्वयं से एक सवाल करना चाहिए—“मेरी संपत्ति बढ़ रही है या मेरे पाप घट रहे हैं?”
यदि धन बढ़ रहा है, लेकिन उसके साथ क्रोध, मान, माया, लोभ और आसक्ति भी बढ़ रही है तो ऐसी संपत्ति का वास्तविक मूल्य क्या है? वहीं बाहरी साधन सीमित होने के बावजूद यदि आत्मदोष कम हो रहे हैं, धर्म के प्रति श्रद्धा बढ़ रही है और जीवन पाप से दूर हो रहा है तो यही सच्ची समृद्धि है।
🌸 संपत्ति के मालिक नहीं, सदुपयोग के ट्रस्टी बनें
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को संपत्ति का केवल मालिक बनने के बजाय उसके सदुपयोग का ट्रस्टी बनना चाहिए। धन आए तो धर्म और समाजसेवा में लगे, वैभव मिले तो विनय बढ़े, प्रतिष्ठा मिले तो अहंकार घटे और सुविधाएं बढ़ें तो आत्मचिंतन भी बढ़ना चाहिए।
बाहरी संपदा तभी सार्थक है, जब वह आत्मिक संपदा को समृद्ध करने का माध्यम बने।
🌺 पाप से बचना ही जीवन की सबसे बड़ी कमाई
मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि संसार की संपत्ति क्षणिक है, जबकि आत्मा की संपदा शाश्वत है। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल धन-संचय नहीं, बल्कि पापास्रव का निरोध, आत्मदोषों का क्षय और आत्मा की निर्मलता होना चाहिए।
जिस दिन मनुष्य यह समझ लेगा कि “पाप से बचना ही सबसे बड़ी कमाई है”, उसी दिन उसके जीवन की दिशा बाहरी वैभव से हटकर आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने लगेगी।
🌸 श्रद्धालुओं ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में किया पुण्यार्जन
धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन शांतिदेवी जी, अभिनंदन सिंघल, श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ, उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती सुजाता पाटिल, गीता कोले एवं समस्त परिवार, महाराष्ट्र द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन अजय जी एवं किरण जी सिंघल परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक प्राप्त किया गया।
🙏 आहारदान का मिला सौभाग्य
श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री अनिल जी एवं दर्शन जी बरमुंडा परिवार को प्राप्त हुआ।
वहीं श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य बाल ब्रह्मचारिणी ज्योति दीदी के परिवार को प्राप्त हुआ।
मंदिर प्रांगण में मातृशक्ति ने डिस्काउंट रेट पर राखियों की खरीदारी की। श्रीमती सपना जैन ने मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रद्धाभावपूर्वक संपन्न किया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
“संपत्ति वह नहीं जो तिजोरी में बढ़े,
संपत्ति वह है जो आत्मा को निर्मल करे।
धन बढ़े तो सेवा बढ़े,
वैभव बढ़े तो विनय बढ़े,
और जीवन में पाप घटे—
यही सच्चे पुण्योदय और पुरुषार्थ की पहचान है।”
अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी की रिपोर्ट
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