*भाव निर्मल हों तो जीवन का हर पल मंगल – आचार्य श्री सुनीलसागर जी*
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर।
आचार्य श्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन की वास्तविक दिशा हमारे भावों से तय होती है। “भाव निर्मल हैं तो हर पल मंगल है, भाव मैले हैं तो हर पल दंगल है।” उन्होंने कहा कि संसार की सुख-सुविधाओं से जीवन कितना ही संपन्न क्यों न हो, धर्म और ध्यान के बिना जीवन अधूरा है। आत्मज्ञान के अभाव में मनुष्य का जीवन मानो जंगल के समान भटकता रहता है।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने से जीवन नहीं बदलता, बल्कि अपने भावों को सुधारना आवश्यक है। भाव सुधरे बिना भावावली सुधरने वाली नहीं और भावावली सुधरे बिना जीवन को मुक्ति की दिशा नहीं मिल सकती।
उद्बोधन में उन्होंने दांपत्य जीवन के 50 वर्ष पूर्ण करने वाले दंपती का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे अवसरों को केवल सांसारिक उत्सव तक सीमित रखने के बजाय धर्ममय और परोपकारमय बनाना चाहिए। विवाह की 50वीं वर्षगांठ पर पुनः विवाह या भव्य
आयोजन करने के स्थान पर ऐसे श्रावकों को तीर्थयात्रा करवानी चाहिए, जो स्वयं यात्रा करने में सक्षम नहीं हैं। उन्हें शिखरजी और गिरनारजी जैसे पवित्र तीर्थों की यात्रा करवाकर इस अवसर को सार्थक बनाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अब तक हमने संसार को पसंद किया, सांसारिक वस्तुओं और सांसारिक लोगों को प्राथमिकता दी, इसलिए हमें संसार ही प्राप्त हुआ। यदि आज से हम अरिहंतों और सिद्धों को पसंद करना, मुनियों की चर्या और साधना को पसंद करना शुरू कर दें, तो जीवन में कभी न कभी उसी दिशा की उपलब्धि अवश्य हो सकती है।
आचार्य श्री ने संदेश दिया कि जीवन के महत्वपूर्ण अवसर केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म, परोपकार और आत्मकल्याण की दिशा में कदम बढ़ाने के अवसर भी बनने चाहिए।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



