गुरु भगवंतों की आज्ञा का पालन ही धर्म का सच्चा मार्ग, दिखावे और अहंकार से बचें : साध्वी डॉ. विद्युत प्रभा श्रीजी
उदयपुर चातुर्मास में गूंजे रामगंजमंडी के समाजबंधुओं के जयकारे, समाजसेवी राजकुमार पारख का हुआ बहुमान
रामगंजमंडी।
झीलों की नगरी उदयपुर के सूरजपोल स्थित मुनि सुव्रत स्वामी मंदिर एवं दादावाड़ी में चातुर्मास के लिए विराजित साध्वी डॉ. विद्युत प्रभा श्रीजी के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में धर्म, त्याग, संयम और जीवन मूल्यों का प्रभावशाली संदेश गूंजा। धर्मसभा में रामगंजमंडी से पहुंचे जैन समाज के गणमान्य समाजबंधुओं की उपस्थिति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
साध्वी डॉ. विद्युत प्रभा श्रीजी ने भगवान महावीर स्वामी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि कठोर साधना के साथ शरीर के प्रति अनासक्ति ने भगवान महावीर को तीर्थंकर बनाया। मनुष्य जब शरीर से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप को पहचानता है, तभी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।
वेदना नहीं, संवेदना को जीवन का आधार बनाएं
साध्वीजी ने वेदना और संवेदना का अंतर समझाते हुए कहा कि अपने दुख को महसूस करना वेदना है, जबकि दूसरों के दुख को महसूस कर उनकी सहायता के लिए आगे बढ़ना संवेदना है। आज मनुष्य अपने दोषों को कम और दूसरों के दोषों को अधिक देखता है।
उन्होंने कहा कि कचरा हमेशा घर के बाहर फेंका जाता है, लेकिन दूसरों की निंदा करते-करते इंसान ने अपने ही मन रूपी घर को नकारात्मकता और दोषों के कचरे से भर लिया है। जीवन को सुंदर बनाना है तो दूसरों में दोष खोजने के बजाय स्वयं के भीतर झांकना होगा।
जैसी दृष्टि, वैसा दिखाई देता है संसार
साध्वीजी ने भगवान श्रीकृष्ण, धर्मराज युधिष्ठिर और दुर्योधन का दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से द्वारिका नगरी में सबसे बुरे व्यक्ति का नाम खोजकर लाने को कहा, जबकि दुर्योधन को सबसे अच्छे व्यक्ति की तलाश करने भेजा।
शाम को दोनों खाली हाथ लौटे। युधिष्ठिर ने कहा कि लोगों में बुराइयां तो मिलीं, लेकिन हर व्यक्ति में अच्छाई भी दिखाई दी, इसलिए किसी को पूरी तरह बुरा नहीं कह सका। वहीं दुर्योधन ने कहा कि अच्छे लोग तो मिले, लेकिन उनमें भी कोई न कोई कमी दिखाई दी, इसलिए किसी को अच्छा नहीं लिख सका।
साध्वीजी ने कहा कि हमारी दृष्टि जैसी होगी, संसार भी हमें वैसा ही दिखाई देगा। आज मनुष्य शरीर की पीड़ा से कम और मन की पीड़ा से अधिक दुखी है। इसलिए मन को निर्मल करना ही वास्तविक सुख का मार्ग है।
गुरु की आज्ञा में ही धर्म और संगठन की शक्ति
साध्वी डॉ. विद्युत प्रभा श्रीजी ने कहा कि सुझाव और आज्ञा में अंतर होता है। सुझाव और विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन निर्णय होने के बाद उसे स्वीकार करने की मानसिकता जरूरी है। गुरु भगवंतों के आदेश और आज्ञा को टालना नहीं चाहिए।
उन्होंने कहा कि जहां आदेश पर ही निरंतर चर्चा और विवाद होने लगे, वहां संघ और परिवार ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकते। जिस स्थान पर निर्णय को स्वीकार करने की मानसिकता होती है, वहीं प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
संसार सार भी है और असार भी
साध्वीजी ने कहा कि संसार सार वाला भी है और असार भी। सार इसलिए कि इसी संसार में भगवान महावीर का जन्म हुआ और उन्होंने तीर्थंकर पद प्राप्त किया। उनके बताए मार्ग पर आज भी असंख्य साधु-साध्वी आत्मकल्याण की साधना कर रहे हैं।
वहीं संसार असार इसलिए है क्योंकि यहां प्राप्त कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है। आज करोड़पति व्यक्ति कल रोडपति हो सकता है। राजा जैसा जीवन जीने वाले व्यक्ति को अंतिम समय में चार लोग भी नसीब न हों, यह भी संसार की अनिश्चितता है।
पर्यावरण के प्रति भी चेताया
साध्वीजी ने आधुनिक जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि फ्रिज और एसी जैसी सुविधाओं के कारण पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने संदेश दिया कि सुविधा और उपभोग की अंधी दौड़ में आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को संकट में नहीं डालना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एसी की ठंडक भले ही कुछ लोगों को मिले, लेकिन उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की गर्मी अनेक लोगों को भुगतनी पड़ सकती है।
समाजसेवी राजकुमार पारख का हुआ बहुमान
धर्मसभा में रामगंजमंडी से उदयपुर दर्शन के लिए पहुंचे समाजसेवी राजकुमार पारख के सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों की साध्वीजी ने सराहना की। उन्होंने उन्हें ‘जिन शासन का बब्बर शेर’ बताते हुए कहा कि खरतरगच्छाधिपति आचार्य मणिप्रभ सूरीश्वर का आशीर्वाद प्राप्त कर उन्होंने मात्र सात माह में शिखरबंद मंदिर का निर्माण कराकर उल्लेखनीय कार्य किया।


साध्वीजी ने कहा कि राजकुमार पारख की विशेषता यह है कि वे स्वयं के लिए मितव्ययी रहते हैं, लेकिन जरूरतमंदों के लिए खुले मन से सहयोग करते हैं।
चातुर्मास कमेटी के सदस्यों ने राजकुमार पारख का सांफा, माला एवं दुपट्टा पहनाकर अभिनंदन किया। धर्मसभा के अंत में राजकुमार पारख ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
उन्होंने बताया कि उनके साथ सुरेंद्र बापना एवं अशोक मालवीय भी नीमच, उदयपुर और कोटा में विराजित साध्वी मंडलों के दर्शन के लिए गए।
: स्टेटस और दिखावे की दौड़ से बचें
महंगी शादियों और दिखावे की प्रवृत्ति पर साध्वीजी ने कहा कि पुराने समय में बेटी के फेरे घर में ही हो जाते थे, लेकिन आज महंगे-महंगे रिसॉर्टों में विवाह करना प्रतिष्ठा और स्टेटस का प्रतीक बनता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि उदयपुर पहले हिल स्टेशन के रूप में जाना जाता था, लेकिन आज यह मैरिज स्टेशन बन गया है। व्यक्ति जीवनभर मान-सम्मान और दिखावे के लिए धन खर्च करता रहता है, लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि आंखें खुली हैं तब तक संपत्ति उसकी है, आंखें बंद होने के बाद वह किसकी होगी, किसी को पता नहीं।
साध्वीजी ने जीवन की नश्वरता को रेखांकित करते हुए कहा—“जीवन में कपड़ों में कितनी भी जेब लगा लो, लेकिन कफन में जेब नहीं होती।” इसलिए धन, वैभव और दिखावे के बजाय धर्म, सेवा, विनय और सदाचार को जीवन की वास्तविक पूंजी बनाना चाहिए।
अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312



