पंडित रतनलाल जी बैनाडा — आगरा की विद्वत्ता परम्परा के एक अमर दीपस्तंभ
लेखक- मनोज कुमार जैन बांकलीवाल आगरा
जैन समाज में आगरा सदैव विद्वानों, शास्त्र-अध्ययन और स्वाध्याय की नगरी के रूप में प्रसिद्ध रहा है। कभी यहां के मंदिर-मंदिर में शास्त्रों की गद्दियां चला करती थीं। यही वह पावन भूमि है, जहां तागगंज में पंडित बनारसीदास जी जैसे महान विद्वान ने समयसार नाटिका जैसी अमर कृति की रचना की।
यह गौरवशाली परम्परा केवल इतिहास बनकर नहीं रह गई। आधुनिक काल में भी आगरा ने ऐसे महान विद्वान को जन्म दिया, जिनकी विद्वत्ता की गूंज केवल आगरा या भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि विश्वभर में पहुंची—पंडित रतनलाल जी बैनाडा।
पंडित जी करणानुयोग के प्रकाण्ड विद्वान थे। उस समय देश में करणानुयोग के गहन अध्ययन-अध्यापन में दक्ष विद्वानों की संख्या बहुत कम थी और उनमें पंडित रतनलाल जी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता था।
सबसे विशेष बात यह थी कि वे एक सफल एवं बड़े उद्योगपति होते हुए भी स्वाध्याय और जिनवाणी के लिए अपना बहुमूल्य समय निकालते थे। विद्वानों और मुनिराजों के प्रति उनकी श्रद्धा तथा आत्मीयता अद्भुत थी।
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रति उनकी विशेष भक्ति थी। अनेक बार शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन वाचन के अवसरों पर वे आचार्य श्री के सान्निध्य में रहकर अध्ययन, मनन और स्वाध्याय करते रहे।
वर्ष 1994 में आगरा के कमला नगर जिनालय के पंचकल्याणक महोत्सव में, जिसमें उनके परिवार द्वारा प्रतिमाओं एवं वेदी की प्रतिष्ठा कराई गई थी, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दो शिष्यों—मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज एवं मुनि श्री सुधासागर जी महाराज—को आगरा लाने में पंडित रतनलाल जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
यही वह अवसर था, जब पंडित जी और मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के बीच आत्मीयता का एक ऐसा संबंध बना, जो आगे चलकर जैन समाज के लिए एक ऐतिहासिक अध्याय बन गया।
यहीं से प्रारम्भ हुई श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर के उदय की कहानी।
जब पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज संस्थान की स्थापना के संकल्प को साकार कर रहे थे, तब उनके मन में संस्थान के प्रथम अधिष्ठाता के रूप में सबसे पहले पंडित रतनलाल जी बैनाडा का नाम आया।
गुरुदेव का आदेश और जिनवाणी के प्रति उनका समर्पण—पंडित जी के लिए इससे बड़ा कोई आह्वान नहीं था।
उन्होंने अपना विशाल कारोबार और कारखाने अपने पुत्रों एवं परिवार को सौंप दिए और अपने जीवन का शेष समय श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर तथा जिनवाणी की सेवा को समर्पित कर दिया।
पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद एवं निर्देशन में पंडित जी की अथक मेहनत से संस्थान निरंतर प्रगति करता गया। अपने जीवनकाल में उन्होंने वहां अनेक विद्वानों को तैयार किया, जो आज भी संस्थान, पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज और जिनवाणी के गौरव को बढ़ा रहे हैं।
उनके द्वारा सिखाया गया तत्त्वार्थसूत्र का उच्चारण और उसका अर्थ आज भी अनेक विद्यार्थियों और विद्वानों की स्मृतियों में जीवंत है।
करणानुयोग के कठिन और गूढ़ ग्रंथों की ‘कड़वी गोली’ को भी वे अपनी मधुर वाणी और सरल समझाने की अद्भुत शैली में इस प्रकार प्रस्तुत करते थे कि कठिन से कठिन विषय भी सहज और रुचिकर बन जाता था।
ऐसे विद्वान केवल पुस्तकों में नहीं मिलते—
वे परम्पराएं बनाते हैं, शिष्य तैयार करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान की मशाल छोड़ जाते हैं।
आज उनकी पुण्यतिथि पर उस महान व्यक्तित्व का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए उन्हें कोटि-कोटि नमन।
🙏 *पंडित रतनलाल जी बैनाडा अमर रहें।*
उनका जीवन, उनकी विद्वत्ता, उनका स्वाध्याय और जिनवाणी के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।
विनम्र श्रद्धांजलि।
— मनोज कुमार जैन बांकलीवाल, आगरा





