स्मृति का झरोखा : 2019 की वह सीख, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है“आधुनिक क्रांति तो हुई, लेकिन शांति खत्म हो गई” — आचार्य विद्यासागरजी महाराज

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

स्मृति का झरोखा : 2019 की वह सीख, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है“आधुनिक क्रांति तो हुई, लेकिन शांति खत्म हो गई” — आचार्य विद्यासागरजी महाराज

विज्ञान और सुविधाओं की दौड़ में मनुष्य ने खो दिया प्रकृति का संतुलन, आयुर्वेद को अपनाने का दिया संदेश

नेमावर।

वर्ष 2019 की स्मृतियों के पन्नों को पलटें तो आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के वे प्रवचन आज भी समाज को आईना दिखाते नजर आते हैं। नेमावर स्थित आचार्य ज्ञानसागर सभागृह, जैन मंदिर परिसर में चातुर्मास के दौरान रविवार को दिए अपने प्रवचन में आचार्यश्री ने आधुनिक विकास, विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य और भारतीय जीवन-पद्धति पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया था।

 

आचार्यश्री ने कहा था कि “आज के युग में आधुनिक क्रांति तो हुई है, लेकिन शांति खत्म हो गई है।” उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी मनुष्य अनेक प्रकार की परतंत्रताओं से घिरा हुआ है। विज्ञान और तकनीक का विकास तेजी से हुआ है, लेकिन इसके साथ बीमारियां और मानसिक अशांति भी बढ़ी हैं।

हवा, पानी और रोशनी भी हुई महंगी

आचार्यश्री ने तत्कालीन परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि आज हवा, पानी और रोशनी जैसी प्राकृतिक चीजों के लिए भी मनुष्य को कीमत चुकानी पड़ रही है। शुद्ध दूध मिलना कठिन हो गया है और पानी तक बिकने लगा है।

उन्होंने इसे आधुनिक जीवन की विडंबना बताते हुए कहा था कि प्रकृति के जिन संसाधनों पर हर जीव का समान अधिकार था, वे भी अब व्यापार का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

प्रदूषित प्रकृति के साथ मन भी हुआ प्रदूषित

आचार्यश्री ने कहा था कि जब हवा और पानी दूषित होते हैं तो उसका प्रभाव केवल शरीर पर नहीं पड़ता, बल्कि मन भी प्रदूषित होने लगता है।

उन्होंने कहा कि विज्ञान के विकास को हम रामराज्य जैसा मान रहे हैं, लेकिन वास्तविक सुख और शांति केवल भौतिक सुविधाओं से प्राप्त नहीं हो सकती। मनुष्य को प्रकृति, स्वास्थ्य और अपनी प्राचीन जीवन-पद्धति के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा।

आयुर्वेद की विरासत को न भूलें

आचार्य विद्यासागरजी महाराज ने भारतीय आयुर्वेद परंपरा की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा था कि भारत के पास हजारों वर्षों पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथ और ज्ञान की समृद्ध परंपरा है। इसके बावजूद हम तत्काल राहत और सुविधा के लिए आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

उन्होंने कहा था कि जिन आयुर्वेदिक सिद्धांतों और पद्धतियों को कभी उपेक्षित किया गया, उन्हें आज विदेशों में भी अपनाने की रुचि बढ़ रही है। ऐसे में भारत को अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को समझने और संरक्षित करने की आवश्यकता है।

2019 की सीख, 2026 में भी सवाल बनकर सामने

आचार्यश्री के ये विचार वर्ष 2019 में व्यक्त किए गए थे, लेकिन आज वर्षों बाद भी उनकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। बढ़ता प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का व्यावसायीकरण, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां और मानसिक तनाव आज भी समाज के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।

“स्मृति का झरोखा” हमें केवल पुरानी घटनाओं की याद नहीं दिलाता, बल्कि उन विचारों से भी रूबरू कराता है, जिनमें आने वाले समय के लिए चेतावनी और जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा छिपी होती है।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो. 9929747312

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