आधुनिकता अपनाएं, लेकिन संस्कार और संस्कृति की जड़ों से न टूटें युवा : आचार्य श्री सुनील सागरजी

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आधुनिकता अपनाएं, लेकिन संस्कार और संस्कृति की जड़ों से न टूटें युवा : आचार्य श्री सुनील सागरजी

मोबाइल-इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के बीच युवाओं को व्यसनमुक्त, संस्कारयुक्त और प्राकृतिक जीवनशैली अपनाने का संदेश

इंदौर।
नेमी नगर जैन कॉलोनी में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री 108सुनील सागरजी महाराज ने युवाओं को आधुनिकता और तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए अपनी संस्कृति, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों से जुड़े रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक संसाधन जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं, लेकिन जब यही संसाधन जीवन पर हावी हो जाएं तो व्यक्ति सामाजिक और पारिवारिक संबंधों से दूर होने लगता है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि आज का युवा आगे बढ़ने की दौड़ में अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग से लोगों के बीच प्रत्यक्ष संवाद और आत्मीयता कम होती जा रही है। व्यक्ति अपने आसपास मौजूद लोगों के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहा है, जिसका असर परिवार और समाज पर दिखाई दे रहा है।

गलत रास्तों से बचाने के लिए संवाद जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि आगे बढ़ने और जल्द सफल होने की चाह में कुछ युवा व्यसनों की गिरफ्त में आ जाते हैं। जल्द अमीर बनने की मानसिकता कई बार युवाओं को गलत रास्तों और आपराधिक गतिविधियों की ओर ले जाती है। वहीं, परिस्थितियों से निराश होकर कुछ युवा आत्महत्या जैसे गंभीर कदम तक पहुंच जाते हैं।

 

उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में परिवार और समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। युवाओं को डांटने या उनसे दूरी बनाने के बजाय उनके साथ संवाद, सहयोग और आत्मीयता बढ़ाने की आवश्यकता है।

मोबाइल के साथ बढ़ रहा Generation Gap
आचार्य श्री ने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग के कारण परिवार के सदस्यों के बीच संवाद का समय घटता जा रहा है। इसका परिणाम Generation Gap के रूप में सामने आ रहा है। इस दूरी को कम करने के लिए जरूरी है कि परिवार के लोग एक-दूसरे के साथ बैठें, प्रत्यक्ष संवाद करें, एक-दूसरे की बात समझें और परस्पर सम्मान की भावना विकसित करें।

 

धर्म भाषण नहीं, जीवन में उतारने का विषय
उन्होंने कहा कि धर्म केवल भाषण देने का विषय नहीं है, बल्कि जीवन में सिद्धांतों को उतारने का माध्यम है। धर्म के नाम पर केवल भाषणबाजी करने के बजाय प्रेम, करुणा, संयम, सदाचार और मानवता जैसे मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारना चाहिए।

 

आचार्य श्री ने कहा कि युवाओं को व्यसनमुक्त और श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा संतों के साथ-साथ समाज के जिम्मेदार लोगों और परिवार से भी मिलनी चाहिए।

युवाओं के भविष्य के प्रति संवेदनशील हो व्यवस्था

आचार्य श्री ने मीडिया के सामाजिक प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि मीडिया समाज और देश को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने युवाओं की शिक्षा और रोजगार से जुड़ी चुनौतियों पर भी चिंता व्यक्त की।

 

उन्होंने कहा कि नीट सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में विद्यार्थी वर्षों तक मेहनत करते हैं। ऐसे में पेपर लीक अथवा परीक्षा संबंधी अनियमितताओं की खबरें सामने आने से विद्यार्थियों की मेहनत और उनका विश्वास प्रभावित होता है। ऐसी परिस्थितियों में युवाओं का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। व्यवस्था को विद्यार्थियों की मेहनत और उनके भविष्य के प्रति संवेदनशील होकर कार्य करना चाहिए।

“जल ही जीवन है, अन्न ही जीवन है”

आचार्य श्री ने युवाओं से प्राकृतिक जीवनशैली अपनाने, जल और अन्न का संरक्षण करने तथा अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़े रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “जल ही जीवन है, अन्न ही जीवन है।” इसलिए जल और अन्न का सदुपयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।उन्होंने कहा कि आधुनिक संसाधन हमारे जीवन को सरल और बेहतर बनाने के लिए हैं, जीवन पर हावी होने के लिए नहीं। युवा यदि शिक्षा, संस्कार, संयम और संस्कृति को साथ लेकर आधुनिकता की ओर बढ़ेंगे तो वे अपने जीवन को सफल बनाने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र को भी सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे।

  • जानकारी: माही जैन धीरावत, पीपलखूंट, प्रतापगढ़
    समाचार संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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