19 दिनों में सिर्फ 2 दिन आहार, 17 दिन निर्जल तप! आचार्य प्रसन्न सागरजी ने कहा—“एआई बुद्धि बढ़ा सकता है, बुद्ध नहीं बना सकता”

धर्म

19 दिनों में सिर्फ 2 दिन आहार, 17 दिन निर्जल तप! आचार्य प्रसन्न सागरजी ने कहा—“एआई बुद्धि बढ़ा सकता है, बुद्ध नहीं बना सकता”

पुष्पगिरी में वर्षायोग के दौरान आचार्य श्री का आत्मचिंतन, विवेक और आत्मनिर्भरता का प्रेरक संदेश

पुष्पगिरी (सोनकच्छ)। अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज की कठोर तप-साधना और उनके गहन चिंतनपूर्ण संदेश ने पुष्पगिरी में उपस्थित गुरु भक्तों को गहराई से प्रभावित किया। 21 जुलाई से 8 अगस्त तक 19 दिनों की अवधि में आचार्य श्री ने केवल 30 जुलाई और 2 अगस्त को आहार ग्रहण किया, जबकि शेष 17 दिन निर्जल उपवास एवं कठिन तप-साधना में व्यतीत किए।

इतनी कठोर साधना के बावजूद आचार्य श्री के चेहरे पर सहजता, प्रसन्नता और आत्मबल श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का विषय बना हुआ है। गुरु भक्तों ने उनकी उग्र तपश्चर्या को नमन करते हुए कहा कि वर्तमान समय में ऐसी साधना आत्मसंयम, दृढ़ इच्छाशक्ति और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत उदाहरण है।

“टकला होने से कोई चाणक्य नहीं हो जाता…”

गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने जीवन की वास्तविक समझ, विवेक और आत्मबोध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा—

“टकला होने से कोई चाणक्य नहीं हो जाता और बीबी को छोड़ देने से कोई गौतम बुद्ध नहीं बन जाता।”

आचार्य श्री ने कहा कि केवल बाहरी रूप, त्याग अथवा परिस्थितियां किसी व्यक्ति को महान नहीं बनातीं। विवेक, आत्मबोध, साधना और जीवन की सही समझ ही मनुष्य को वास्तविक ऊंचाई प्रदान करती है।

“एआई उधार की बुद्धि है, सत्संग से जागता है विवेक”

वर्तमान दौर में तेजी से बढ़ते एआई (Artificial Intelligence) के प्रभाव पर आचार्य श्री ने गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा—

“एआई यानी उधार की बुद्धि, जबकि सत्संग और समझदारी से विवेक जागता है।”

उन्होंने कहा कि आज छोटे से लेकर बड़े तक और अनपढ़ से लेकर बुद्धिमान तक अनेक लोग एआई के बढ़ते प्रभाव में उलझते जा रहे हैं। एआई का उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन उस पर अत्यधिक निर्भर होकर अपनी प्रतिभा, मौलिक सोच और निर्णय क्षमता को कमजोर कर देना उचित नहीं है।

एआई जानकारी दे सकता है, लेकिन समझदार नहीं बना सकता

आचार्य श्री ने कहा कि एआई जानकारी दे सकता है, लेकिन समझदार नहीं बना सकता। वह बुद्धि को बढ़ा सकता है, लेकिन बुद्ध नहीं बना सकता। वह प्रश्नों के उत्तर दे सकता है, लेकिन उत्तरदायित्व का बोध नहीं करा सकता।

उन्होंने कहा कि एआई सुख-सुविधाओं के साधन बता सकता है, लेकिन भीतर का सुख और आनंद प्रदान नहीं कर सकता। वह बाहरी यात्रा में सहयोगी बन सकता है, लेकिन अंतरात्मा की यात्रा का साथी नहीं बन सकता।

आचार्य श्री ने कहा कि एआई हमारी सोच को प्रभावित कर सकता है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन मनुष्य को स्वयं करना पड़ता है।

“एआई साधन है, जीवन का साध्य नहीं”

आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि तकनीक का उपयोग मानव जीवन को सरल और बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, न कि मनुष्य की अपनी प्रतिभा, विवेक और आत्मनिर्भरता को समाप्त करने के लिए।

उन्होंने कहा—

“एआई एक साधन हो सकता है, लेकिन जीवन का साध्य नहीं। एआई आपको दिशा दे सकता है, लेकिन गति नहीं।”

उन्होंने युवाओं और समाज का आह्वान करते हुए कहा कि तकनीक का सदुपयोग करें, लेकिन अपनी मौलिक प्रतिभा और चिंतन शक्ति को जीवित रखें। सत्संग, अध्यात्म और आत्मचिंतन से जुड़कर अपने विवेक को जागृत करें।

“पराधीनता की खीर-पूड़ी से बेहतर स्वतंत्रता की सूखी रोटी”

आचार्य श्री ने अपने संदेश को सारगर्भित करते हुए कहा—

“पराधीनता की खीर-पूड़ी खाने से अच्छा है, स्वतंत्रता की सूखी रोटी खा लेना।”

आचार्य श्री का यह संदेश उपस्थित गुरु भक्तों को आत्मचिंतन और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित कर गया। एक ओर उनकी कठोर तप-साधना श्रद्धालुओं के लिए त्याग, संयम और आत्मबल का प्रेरणादायी उदाहरण बनी, वहीं दूसरी ओर एआई और आधुनिक तकनीक के दौर में अपनी मौलिक बुद्धि, विवेक और आत्मनिर्भरता को बचाए रखने का संदेश समाज के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन बनकर सामने आया।

प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल

औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी

संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

संपर्क: 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *