राष्ट्रसंत सारस्वताचार्य श्री देवनंदी जी महाराज का णमोकार तीर्थ पर 64 वाँ जन्म जयंती महामहोत्सव
—————————————————
प्रज्ञाश्रमण सर्वोदयी राष्ट्रसंत सारस्वताचार्य पूज्यपाद वात्सल्य रत्नाकर, णमोकार तीर्थ प्रणेता पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री देवनंदी जी महाराज का जन्म 15 अगस्त 1963 को हुआ था। वर्ष 2026 में आयोजित होने वाला उनका 64वाँ जन्म जयंती महोत्सव एक अद्वितीय अवसर है, जहाँ भारत की आजादी के पर्व का जश्न भी एक साथ हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाएगा।
महातीर्थ णमोकार तीर्थ—जहाँ युगों की अखंड साधना, अनंत आस्था और संस्कारों का दिव्य संगम है। यह त्याग की वह पावन भूमि है, जहाँ प्रत्येक शिला जिनवाणी का संदेश देती है और हर दिशा में संतों के आशीर्वाद की सुगंध बिखरती है। यह णमोकार तीर्थ अतिशय युक्त स्थली भी है, जहाँ नाग-नागिन के युगल जोड़े ने ऋषि पंचमी जैसे पावन दिवस पर पूज्य गुरुदेव के समीप आकर लगभग 35 मिनट तक मांगलिक क्रीड़ा की और गुरुदेव से णमोकार महामंत्र सुनकर आशीर्वाद ग्रहण किया। इस अद्भुत दृश्य के दर्शन संघ में उपस्थित सैकड़ों लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से किए।
ऐतिहासिक दो सिद्ध क्षेत्रों की पर्वतीय श्रृंखलाओं के मध्य स्थित इस पावन भूमि को पौराणिक मान्यता के अनुसार “रामटेकड़ी” भी कहा जाता है, जहाँ श्रीराम जी ने भी विचरण किया था। इस णमोकार भूमि को परमपूज्य गणाचार्य 108 श्री कुंथु सागर जी महाराज का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है। उनके उत्तराधिकारी परम शिष्य सारस्वताचार्य 108 श्री देवनंदी जी महाराज की सामाजिक और धार्मिक उत्थान हेतु तीर्थ के विकास की परिकल्पना से यहाँ अद्भुत निर्माण कार्य हुए हैं—
* विश्व में एकमात्र ‘बोलते हुए णमोकार मंत्र’ पर आधारित समवशरण (5.5 एकड़ में फैला, 108 फीट ऊँचा)।
* सफेद संगमरमर से निर्मित 32 फीट ऊँची भगवान चंद्रप्रभु की प्रतिमा।
* त्रिकाल चौबीसी, 24 जिनालय, नवदेवता, नंदीश्वर द्वीप, पंचमेरु तथा 24 स्वरूपों वाली पद्मावती माता की प्रतिमाएँ।
* विश्व में प्रथम बार 51 फीट अरिहंत और 31 फीट की शेष पंचपरमेष्ठी प्रतिमाएँ।
* नौका विहार व मिनी ट्रेन से दर्शन की सुविधा।
* णमोकार आराधना केंद्र, डिजिटल प्रभावना केंद्र, गुरुमंदिर, प्राचीन तीर्थंकर प्रतिमाएँ, ग्रंथालय, संत भवन, धर्मशाला, मंगल कार्यालय व विभिन्न सामाजिक उपक्रम—जो अत्यंत अल्प समय में साकार हुए हैं।
“यस्य वाचि शांतिः, दृष्टि में करुणा, और चाल में मोक्षमार्ग हो—वे हैं आचार्य श्री देवनंदी जी महामुनिराज।”
ज्ञानं यः प्रकाशयति स एव गुरु:—जिन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि जीवन जीने की सच्ची राह दिखाई।
णमोकार तीर्थ — जहाँ श्रद्धा साकार होती है
अनंत आस्था, अखंड साधना और संस्कारों का दिव्य संगम तथा त्याग की भूमि…
जहाँ प्रत्येक शिला जिनवाणी का संदेश देती है,
जहाँ हर दिशा में धर्म की सुगंध बिखरती है,
जहाँ हर मार्ग धर्म की ओर ले जाता है—युगों की साधना, संतों के आशीर्वाद और भक्तों के प्रत्येक क्षण जिनशासन के प्रति समर्पण से साकार हो रही यह दिव्य पावन धरा है।
कर्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय।
सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय।।
सात समुद्र की मसि करूँ, लेखनि सब बनराय।’
सब धरती कागद करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।
णमोकार तीर्थ महामहोत्सव केवल एक आयोजन नहीं था—वह अध्यात्म, अनुशासन और अतिशय का जीवंत चमत्कार था। जिस प्रकार पृथ्वी अपनी धुरी पर निरंतर, निर्विघ्न घूमती रहती है—ठीक उसी प्रकार यह विराट आयोजन भी सहज, स्वाभाविक और पूर्ण व्यवस्था के साथ संपन्न हुआ।
पंचकल्याणक ने केवल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की; उसने स्मरण कराया कि हर आत्मा में परमात्मा बनने की संभावना है—गर्भ से संस्कार, जन्म से संभावना, तप से उत्कर्ष, ज्ञान से प्रकाश और मोक्ष से पूर्णता। णमोकार तीर्थ की उस पुण्यधरा पर मैंने भीड़ नहीं देखी; मैंने चेतना का महासागर देखा। मैंने केवल आयोजन नहीं देखा; मैंने गुरु की दृष्टि से सृष्टि को चलते देखा। मैंने केवल प्रतिमा नहीं देखी; मैंने अपने भीतर की जड़ता को पिघलते देखा।
एक स्वप्न का साकार होना…
डेढ़ दशक पहले की वह शाम याद है—टीनशेड के दालान में गुरुदेव तख्त पर बैठे थे। उन्होंने कहा था—“भैया, मैं इस तख्त पर विश्राम करता हूँ, आप नीचे चटाई बिछा लो।”
आज वही भूमि तीन सितारा सुविधाओं को मात देने वाली धर्मशालाओं से सुसज्जित है। लग्ज़री कॉटेज, विशाल मंडप, सुव्यवस्थित परिसर और बीहड़-सी प्रतीत होने वाली जमीन को जन्नत बना देना—यह केवल वास्तु-कौशल नहीं, यह गुरुदेव की दृष्टि, संकल्प और साधना का परिणाम है।
णमोकार तीर्थ केवल एक तीर्थ नहीं—यह कल्पना से परे अध्यात्म का साकार रूप है। यह प्रबंधन-कौशल की अद्वितीय मिसाल और गुरु-कृपा का जीवंत प्रमाण है। सच में—यह मात्र एक आयोजन नहीं, एक नवीन युग की स्थापना है, जिसका नाम है “णमोकार युग।”
इंजीनियर, आर्किटेक्ट और सिविल वर्क के जानकार दाँतों तले उँगली दबाते हुए पूछते—“यह कैसे संभव हुआ?”
उन्हें कौन समझाए कि यह केवल तकनीक नहीं… यह गुरु-दृष्टि, संकल्प और गुरु-कृपा है। णमोकार तीर्थ सीमेंट, रेत और पत्थरों का समूह नहीं—जीवंत चेतना का केंद्र है। यहाँ आकर समझ आता है कि जब गुरु की दृष्टि साथ हो, तो सृष्टि स्वयं सहयोगी बन जाती है।
जगतगुरु आचार्य श्री 108 कुंथुसागर जी महामुनिराज, तीर्थंकर भगवान का प्रतिरूप बनकर गणधर रूप में विराजमान हुए और उन्होंने सभी के प्रश्नों के सहज, शांत व दिव्य उत्तर दिए। ऐसा लग रहा था मानो कालखंड पीछे लौट गया हो और हम सचमुच तीर्थंकर भगवान के समवशरण में बैठे हों। चंचल चाँदनी श्वेत मेरु समान समवशरण पर पड़ रही थी। समवशरण के चारों ओर जलधारा प्रवाहित हो रही थी। उस जल में आकाश का प्रतिबिंब देखकर ऐसा लगा मानो आकाशगंगा स्वयं इस दिव्य स्थल की परिक्रमा करने उतर आई हो। 108 फीट ऊँचा समवशरण, पंचपरमेष्ठी की उत्तुंग प्रतिमाएँ और समवशरण के गर्भ में स्थित भगवान चंद्रप्रभु की मनोज्ञ प्रतिमा के दर्शन मात्र से चित्त प्रफुल्लित और आत्म-स्तंभित हो जाता है। यह परंपरा “जीवन और निर्वाण” के निरंतर प्रवाह का साक्षात् प्रमाण है।
30 से अधिक जैनाचार्यों का सानिध्य, 400 से अधिक साधु-साध्वियाँ और सैकड़ों तपस्वी पदविहार करते हुए क्षेत्र पर विराजमान हुए। चौका-व्यवस्था इतनी अनुशासित थी कि देवता भी विस्मित हो जाएँ। सच कहूँ—यहाँ की पावन मिट्टी, जहाँ अनेक साधु-परमेष्ठी मुनियों के चरण पड़े, उन्हीं चरणों के स्पर्श से यहाँ की धूल के कण-कण में प्राण जाग उठे। यहाँ बहती बयार साधुओं की आभा के संपर्क में आने से प्राणवायु-सी सुशोभित हो गई।
चारों दिशाओं में आचार्य परमेष्ठी महाश्रमण जनों का सानिध्य रहा। बाल ब्रह्मचारिणी वैशाली दीदी द्वारा प्रस्तावना के साथ, ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री नीलम जी (अजमेर) व श्री संतोष पैंढारी (नागपुर) की अध्यक्षता में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पंचकल्याणक महामहोत्सव 6 फरवरी से 13 फरवरी 2026 तक एवं महामस्तकाभिषेक 25 फरवरी 2026 तक संपन्न हुआ।
णमोकार तीर्थ, मुंबई-आगरा हाईवे नंबर 3, मोहाड़ी (मांसले), तालुका/तहसील चांदवड़, जिला नाशिक (महाराष्ट्र) में स्थित है।
* रेल मार्ग: नासिक रोड स्टेशन (45 किमी), मनमाड (35 किमी)
* वायु मार्ग: ओझर एयरपोर्ट (60 किमी)
सिद्ध क्षेत्र गजपंथा और सिद्ध क्षेत्र मांगीतुंगी के मध्य स्थित श्री णमोकार तीर्थ अपने भौगोलिक सौंदर्य के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक गरिमा के लिए भी जाना जाता है। मनमाड़, नासिक, शिरडी और त्र्यंबकेश्वर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के समीप स्थित यह तीर्थ आत्मशुद्धि और अंतर्मुखी साधना का एक प्रभावशाली केंद्र बन चुका है।
बुंदेलखंड वसुंधरा की शाहगढ़ नगरी में जन्मे सारस्वताचार्य श्री देवनंदी जी महाराज के 64 वें जन्म जयंती महामहोत्सव के इस अद्वितीय आध्यात्मिक अवसर पर आइए—
“जिंदगी सँवारने को तो जिंदगी पड़ी है,
चलो वो लम्हा सँवार लेते हैं, जहाँ जिंदगी खड़ी है।”
जुड़ना बड़ी बात नहीं, जुड़े रहना बड़ी बात है।
“गुरु पद पंकज रज सिर धारे, मिटे सकल संताप हमारे।”
चरणों में नमन
पवन घुवारा (भूमिपुत्र)
