इंदौर… इस बार तुमसे सचमुच ईर्ष्या हो रही है।

धर्म

इंदौर… इस बार तुमसे सचमुच ईर्ष्या हो रही है।

क्योंकि किसी नगर का सौभाग्य तब पूर्ण होता है, जब वहाँ धर्म, तप और त्याग की त्रिवेणी एक साथ प्रवाहित हो। इस वर्ष इंदौर केवल एक शहर नहीं, बल्कि साधना की राजधानी बन गया है। यह केवल इंदौर जैन समाज का ही नहीं, बल्कि उन असंख्य पुण्यात्माओं का सौभाग्य है, जिनके संचित पुण्यों ने उन्हें एक साथ दो महामनीषी तपस्वियों के सान्निध्य का अवसर प्रदान किया है।

 

 

नेमीनगर जैन कॉलोनी में विराजमान आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज तप, त्याग, शास्त्रज्ञान, विनम्रता और अनुशासन की सजीव प्रतिमूर्ति हैं। उनके व्यक्तित्व में वैराग्य की गंभीरता है तो वाणी में करुणा की मधुरता। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा के निकट ले जाने की महान साधना है। उनके तेजस्वी मुखमंडल के दर्शन मात्र से मन श्रद्धा से भर उठता है। ऐसा लगता है मानो वर्षों की भटकती हुई चेतना को एक स्थिर दिशा मिल गई हो। उनके चरणों में बैठकर मनुष्य केवल प्रवचन नहीं सुनता, बल्कि जीवन जीने की कला सीखता है। उनके संघ का अनुशासन और उनके प्रति उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ स्वयं प्रमाण है कि सच्चा संत कभी प्रचार से महान नहीं बनता, उसका तप ही उसका परिचय बन जाता है।

 

 

और जब कदम दलाल बाग की ओर बढ़ते हैं, तब वहाँ जगत पूज्य मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज का तेज वातावरण को ही परिवर्तित कर देता है। उन्होंने अपने अद्वितीय संयम, कठोर तप, ओजस्वी वचनों और अप्रतिम साधना से आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गौरव को विश्वभर में नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। वे केवल प्रवचनकार नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माता हैं। उनके निर्देशन में चलने वाला श्रावक संस्कार शिविर आज जैन समाज की ऐसी अमूल्य धरोहर बन चुका है, जहाँ पहुँचने वाला प्रत्येक शिविरार्थी स्वयं को सौभाग्यशाली अनुभव करता है। वहाँ केवल ज्ञान नहीं मिलता, वहाँ जीवन बदलता है। वहाँ केवल संस्कार नहीं दिए जाते, वहाँ चरित्र गढ़े जाते हैं। गुरुदेव ऐसे बालयोगियों का निर्माण कर रहे हैं जो आने वाले दशकों तक जैन धर्म की पताका को विश्वभर में गौरवान्वित करेंगे।

कहा जाता है कि भगवान के दर्शन दुर्लभ हैं, परंतु भगवान के मार्ग पर चलने वाले सच्चे संतों के दर्शन भी उससे कम दुर्लभ नहीं। जिन भाग्यवानों को ऐसे तपस्वियों के साक्षात दर्शन प्राप्त होते हैं, उनके जीवन में अद्भुत परिवर्तन देखने को मिलता है। श्रद्धा से की गई वंदना मन को निर्मल करती है, चरण-स्पर्श अहंकार को गलाता है, पाद-प्रक्षालन का सौभाग्य आत्मा को अनुपम शांति प्रदान करता है और संतों का आशीर्वाद जीवन की बाधाओं को पार करने का अदृश्य संबल बन जाता है। ऐसी मान्यता है कि संतों की निर्मल तपश्चर्या से प्रेरणा लेकर मनुष्य अपने जीवन में धर्म, संयम और सदाचार की ओर अग्रसर होता है। उनका सान्निध्य व्यक्ति के विचारों को ऊँचा उठाता है और उसे आत्मकल्याण की दिशा में प्रेरित करता है।

यह लिखने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि इस बार मुझे इंदौर से ईर्ष्या हो रही है। क्योंकि ऐसा महासौभाग्य हर नगर के भाग्य में नहीं लिखा होता। दो-दो महान तपस्वियों की एक साथ मंगलमयी उपस्थिति किसी भी नगर के आध्यात्मिक इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन जाती है। किंतु इस मधुर ईर्ष्या को मैंने भी कुछ हद तक शांत कर लिया, क्योंकि इस बार इंदौर में रहकर इन दोनों महापुरुषों के साक्षात दर्शन, वंदना और आशीर्वाद का लाभ लेने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ।

यदि अभी तक आपने इस दुर्लभ अवसर का लाभ नहीं लिया है, तो विलंब मत कीजिए। ऐसे संत बार-बार नहीं मिलते, ऐसे संयोग बार-बार नहीं आते और ऐसा सौभाग्य बार-बार नहीं जागता।
जिस जीवन में संतों का सान्निध्य जुड़ जाता है, वहाँ से उन्नति, शांति और आत्मविश्वास की नई यात्रा प्रारंभ हो जाती है।

#श्रीश ललितपुर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *