‘विनय ही विकास की पहली सीढ़ी, अहंकार पतन का कारण’ — आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी का प्रेरक संदेश
चातुर्मास प्रवचन में बोले आचार्य भगवंत— कठिनाइयाँ नहीं, सफलता की सीढ़ियाँ हैं चुनौतियाँ
हैदराबाद।
परम पूज्य सूरि सम्राट, गुणायाजी तीर्थ जीर्णोद्धार प्रेरक एवं खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने 5 अगस्त 2026 को चातुर्मास के मंगल प्रवचन में जीवन के वास्तविक विकास का मूल मंत्र बताते हुए कहा कि “विनय ही विकास का पहला पगथिया (सीढ़ी) है।” उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में विनय, श्रद्धा और समर्पण का भाव जागृत हो जाता है, उसके लिए सफलता और आत्मोन्नति के सभी द्वार स्वतः खुल जाते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है, पीछे नहीं। जैसे वाहन में आगे बढ़ने के लिए अनेक गियर होते हैं और पीछे जाने के लिए केवल एक, उसी प्रकार जीवन भी हमें निरंतर प्रगति की दिशा में चलने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक नए दिन की शुरुआत आगे बढ़ने के संकल्प के साथ होनी चाहिए, पीछे हटने के विचार के साथ नहीं।
उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ बाधाएँ नहीं, बल्कि हमारी क्षमता को निखारने वाली परीक्षाएँ हैं। संघर्ष, धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ अर्जित सफलता का आनंद कहीं अधिक स्थायी होता है। इसलिए प्रारंभिक असफलताओं से निराश होने के बजाय आत्मविश्वास और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ना ही सच्ची विजय का मार्ग है।
उत्तराध्ययन सूत्र की प्रथम गाथा का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि विकास की पहली सीढ़ी विनय है। विनय केवल हाथ जोड़ने या सिर झुकाने का नाम नहीं, बल्कि माता-पिता, गुरुजनों, बड़ों तथा अपनी आत्मा के प्रति श्रद्धा, सम्मान और समर्पण का भाव है। जिस हृदय में विनय का उदय होता है, उसके व्यक्तित्व में स्वतः श्रेष्ठता का विकास होने लगता है।
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने अपने दीक्षा जीवन का एक प्रेरक संस्मरण भी सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार उनके हाथ से पात्र टूट गया था, लेकिन उनके पूज्य गुरुभाई दर्शनसागरजी महाराज ने उसका दोष स्वयं अपने ऊपर ले लिया। इस घटना ने उन्हें त्याग, विनय और दूसरों की रक्षा करने की भावना का अमूल्य संस्कार दिया। बाद में जब उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की तो गुरु महाराज ने केवल इतना कहा— “आगे से ध्यान रखना।” आचार्य श्री ने कहा कि यही गुरु की करुणा और संस्कारों की सर्वोत्तम शिक्षा है।
अपने प्रवचन के समापन में आचार्य श्री ने कहा कि परिवार, समाज, व्यापार और धर्म—हर क्षेत्र में जहाँ विनय, आदर और समर्पण है, वहीं प्रेम, शांति और वास्तविक विकास संभव है। यदि जीवन की ऊँचाइयों तक पहुँचना है तो सबसे पहले विनय की पहली सीढ़ी पर दृढ़ता से कदम रखना होगा।
— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



