“वस्तु का वास्तविक महत्व उसके गुणों से होता है, बाहरी रूप से नहीं” — भारत गौरव आर्यिका रत्न स्वस्तिभूषण माताजी सम्यक दर्शन का गूढ़ रहस्य समझाया, कहा— बच्चों में संस्कारों

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“वस्तु का वास्तविक महत्व उसके गुणों से होता है, बाहरी रूप से नहीं” — भारत गौरव आर्यिका रत्न स्वस्तिभूषण माताजी

सम्यक दर्शन का गूढ़ रहस्य समझाया, कहा— बच्चों में संस्कारों की पहली पाठशाला परिवार है
केशवरायपाटन।
श्रीमुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में चल रहे पावन वर्षायोग के दौरान भारत गौरव आर्यिका रत्न 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए सम्यक दर्शन के महत्व पर अत्यंत प्रेरणादायी एवं ज्ञानवर्धक प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि किसी भी वस्तु का वास्तविक महत्व उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके गुणों से निर्धारित होता है। जिस वस्तु में जितने श्रेष्ठ गुण होते हैं, उसका महत्व उतना ही अधिक होता है। यही सिद्धांत मनुष्य के जीवन पर भी समान रूप से लागू होता है।

 

 

माताजी ने तत्त्वार्थसूत्र में वर्णित सम्यक दर्शन के विभिन्न आयामों का सरल भाषा में विवेचन करते हुए कहा कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए ‘क्षेत्र’ का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। क्षेत्र के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि वर्तमान में सम्यक दर्शन कहाँ विद्यमान है तथा किसी भी वस्तु की भूत, वर्तमान और भविष्य की स्थिति का सही बोध होता है।

 

उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर खेती होती है उसे खेत, संस्कृत में क्षेत्र और सामान्य भाषा में स्थान कहा जाता है। इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से ‘शिख-क्षेत्र’ मोक्षरूपी भूमि का प्रतीक है, जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होती है।

 

 

प्रवचन के दौरान माताजी ने सम्यक दर्शन के स्पर्श, काल, अंतर और अल्पबहुत्व का भी विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि स्पर्श का अर्थ किसी वस्तु के विस्तार या उसकी पहुँच से है, जबकि काल उस अवधि को दर्शाता है, जितने समय तक कोई गुण या अवस्था विद्यमान रहती है। अंतर का अर्थ सम्यक दर्शन के छूटने और पुनः प्राप्त होने के बीच का समय है, वहीं अल्पबहुत्व के माध्यम से पदार्थों की न्यूनता और अधिकता का विवेचन किया जाता है।

एक्सपर्ट व्यू : बच्चों के संस्कारों की शुरुआत घर से करें
धर्मसभा के अंत में स्वस्तिभूषण माताजी ने परिवारों को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि बच्चों में संस्कारों की नींव घर से ही रखी जाती है। माता-पिता का आचरण ही बच्चों के लिए सबसे बड़ा आदर्श होता है। यदि परिवार में सम्मान, अनुशासन, जिम्मेदारी और सहयोग का वातावरण होगा तो बच्चे स्वतः उन्हीं मूल्यों को अपनाएंगे।

 

उन्होंने अभिभावकों से आह्वान किया कि बच्चों को अच्छी पुस्तकें पढ़ने, बड़ों का सम्मान करने, प्रकृति और समाज के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा दें। केवल उपदेश देने के बजाय उन्हें अच्छे कार्यों में सहभागी बनाएं तथा छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपकर उनमें आत्मविश्वास, नैतिकता और नेतृत्व क्षमता का विकास करें।
— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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