डिप्रेशन और आत्महत्या के विचारों से कैसे निकलें? मुनिश्री सुधासागर महाराज ने बताया साहस और भक्ति का प्रभावी मार्ग

धर्म

डिप्रेशन और आत्महत्या के विचारों से कैसे निकलें? मुनिश्री सुधासागर महाराज ने बताया साहस और भक्ति का प्रभावी मार्ग

इंदौर।

परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर महाराज इन दिनों इंदौर में वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में आयोजित जिज्ञासा समाधान कार्यक्रम में एक श्रद्धालु ने डिप्रेशन, तनाव और जीवन से निराशा जैसे गंभीर विषय पर प्रश्न किया। इस पर मुनिश्री ने अत्यंत प्रेरणादायी और आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करते हुए कहा कि निराशा जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मबल जगाने का अवसर है।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि आज अनेक लोग छोटी-छोटी कठिनाइयों से घबराकर स्वयं को असफल मान लेते हैं। कुछ लोग तो यह सोचने लगते हैं कि अब वे किसी काम के नहीं रहे और जीवन समाप्त कर देना ही उचित है। ऐसी मानसिक स्थिति से बाहर निकलने के लिए उन्होंने भक्तामर स्तोत्र के चौथे श्लोक का नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने की प्रेरणा दी।

 

 

उन्होंने कहा कि आचार्य मानतुंग ने इस श्लोक में ऐसे विकराल समुद्र का वर्णन किया है, जिसमें प्रलयकाल जैसी ऊँची लहरें उठ रही हों और चारों ओर मगरमच्छ हों। ऐसे भयावह समुद्र को कोई अपनी भुजाओं के बल पर पार नहीं कर सकता। यह उदाहरण बताता है कि मनुष्य की अपनी शक्ति सीमित हो सकती है, लेकिन श्रद्धा, भक्ति और आत्मविश्वास उसे असंभव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों से भी बाहर निकाल सकते हैं।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि “मनुष्य दो-दो मिनट में हताश होकर डिप्रेशन में चला जाता है, जबकि अभी न तो संकट का अंत है और न ही जीवन समाप्त करने का समय। साहस के साथ आगे बढ़ो, कोई भी कार्य असंभव नहीं है।”

 

 

उन्होंने कहा कि भक्तामर स्तोत्र का यह श्लोक इतना प्रेरक है कि “ठंडा खून भी खौलने लगता है और जो व्यक्ति हार मान चुका हो, उसके भीतर भी नया उत्साह जाग उठता है।”

 

अपने सहज और प्रेरक अंदाज में मुनिश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति निराशा और डिप्रेशन से घिर जाए तो उसे दवाइयों के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति का भी सहारा लेना चाहिए। उन्होंने भक्तामर स्तोत्र के इस श्लोक को “आध्यात्मिक औषधि” बताते हुए कहा कि श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका 108 बार जाप करने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण विकसित होता है।

 

मुनिश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि कठिन परिस्थितियों में घबराने या हार मानने के बजाय धैर्य, साहस, भक्ति और आत्मविश्वास को अपना सबसे बड़ा संबल बनाएं। उनका संदेश था कि जीवन ईश्वर का अमूल्य उपहार है और हर कठिनाई का समाधान धैर्य, सकारात्मक सोच तथा आध्यात्मिक साधना के माध्यम से संभव है।

     संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *