विचार-करुणा-आशा के प्रतीक – जगतपूज्य श्रीश ललितपुर की विशेष कलम
भीड़ में मैं गुरुदेव के दर्शनों की आस लिए खड़ा था। तभी एक सज्जन मेरे पास आए और मुस्कुराते हुए बोले, “क्या आप ललितपुर से हैं?” मैंने हाँ में उत्तर दिया। इतना सुनते ही उनका चेहरा बदल गया। वे भावुक स्वर में बोले, “मैं आपसे अपने एक मित्र के साथ मिला था। उन दिनों वह बहुत गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। उसकी बस एक ही तीव्र इच्छा थी—किसी तरह जगत पूज्य गुरुदेव के दर्शन हो जाएँ और उनके चरणों का प्रक्षालन करने का सौभाग्य मिल जाए।”
इतना कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। गला रुंध गया। कुछ क्षण बाद वे बोले, “काश… आज बुल्ली जीवित होता। वह कितना आनंदित होता कि जिन गुरुदेव के दर्शन के लिए वह तरसता रहा, वे स्वयं उसके गाँव पधार गए हैं।”
उनके शब्द सुनकर मैं भी कुछ क्षण के लिए मौन हो गया। पुरानी स्मृतियाँ चलचित्र की तरह आँखों के सामने तैरने लगीं।
मुझे आज भी याद है, उन दिनों मैं प्रिंस बुल्ली के लेख पढ़ता था। कई बार उससे चर्चा हुई। उसके लेखों में पीड़ा थी, आक्रोश था, निराशा थी। मैंने जितना संभव हुआ, उसे सकारात्मक सोच की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया। धीरे-धीरे संवाद आगे बढ़ा, लेकिन नियति को कुछ और ही स्वीकार था। कुछ समय बाद उसके गंभीर रोग की पुष्टि हुई और देखते ही देखते वह इस संसार से असमय विदा हो गया।
आज मैं बिना किसी संकोच के स्वीकार करता हूँ कि यदि मुझे लेखन की प्रेरणा किसी ने दी, तो वह प्रिंस बुल्ली ही था। उसके नकारात्मक लेखों ने मुझे यह सोचने पर विवश किया कि संसार को निराशा नहीं, आशा की आवश्यकता है। उसी दिन मैंने निश्चय किया कि मेरी लेखनी जहाँ तक संभव होगा, सकारात्मकता का संदेश देगी। वह प्रयास आज भी निरंतर जारी है।
समय ने मुझे एक गहरा सत्य सिखाया है—नकारात्मक शब्द क्षणिक शोर पैदा कर सकते हैं, लेकिन सकारात्मक विचार पीढ़ियों तक प्रकाश फैलाते हैं। कटुता लोगों को बाँटती है, जबकि सद्भाव लोगों को जोड़ता है। दुर्भाग्य से इस सत्य का एहसास बुल्ली को तब हुआ, जब समय उसके हाथों से फिसल चुका था।
इसीलिए मैं उन सभी महानुभावों से एक विनम्र आग्रह करना चाहता हूँ जो लिखते हैं, बोलते हैं या समाज को प्रभावित करते हैं—आप किसके पक्ष में लिखते हैं, कितना लिखते हैं, यह आपका अधिकार है; परंतु आपके विचारों की दिशा सकारात्मक होनी चाहिए। शब्द केवल वाक्य नहीं बनाते, वे व्यक्तित्व गढ़ते हैं, समाज का वातावरण निर्मित करते हैं और कभी-कभी किसी टूटे हुए मन को जीने का साहस भी दे देते हैं।
इसलिए ऐसी लेखनी छोड़कर जाइए जो विवाद नहीं, विचार दे; कटुता नहीं, करुणा दे; निराशा नहीं, नई आशा दे। यही शब्दों की सबसे बड़ी साधना है और यही लेखन की सच्ची सफलता।




