जीवन के तीन मोड़ और अध्यात्म का मार्ग : आचार्य श्री सुनील सागर महाराज ने समय, शक्ति और समझ का गूढ़ रहस्य समझाया
इंदौर
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने जीवन की अनमोल यात्रा का अत्यंत मार्मिक एवं प्रेरक विवेचन करते हुए कहा कि “जीवन एक अंतर्देशीय लिफाफे के समान है। जैसे अंतर्देशीय पत्र एक बार मुड़ता है, फिर दूसरी बार मुड़ता है और तीसरी बार मुड़ते ही डाक में भेज दिया जाता है, उसी प्रकार जीवन भी तीन महत्वपूर्ण मोड़ों से होकर गुजरता है— बचपन, युवावस्था और बुढ़ापा। इसके बाद प्रत्येक जीव को इस संसार से प्रस्थान करना ही पड़ता है।”
आचार्य श्री ने बताया कि बचपन में समय और शक्ति दोनों प्रचुर मात्रा में होते हैं, किंतु धन का अभाव रहता है। बालक अपनी असीम ऊर्जा से पूरे घर को आनंदित और कभी-कभी व्यस्त भी कर देते हैं, पर उनके पास आर्थिक साधन नहीं होते।
युवावस्था का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इस अवस्था में शक्ति और धन तो प्राप्त हो जाते हैं, परंतु समय का अभाव सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। जीवन की भागदौड़ में व्यक्ति स्वयं के लिए भी समय नहीं निकाल पाता।
बुढ़ापे में समय और धन उपलब्ध हो सकते हैं, किंतु शरीर की शक्ति साथ नहीं देती। इस प्रकार जीवन की प्रत्येक अवस्था में कोई-न-कोई कमी बनी रहती है।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि संसार में समय और समझ का एक साथ मिलना अत्यंत दुर्लभ है। प्रायः जब समय होता है तब समझ नहीं होती और जब समझ आती है तब समय हाथ से निकल चुका होता है। किंतु जो सौभाग्यशाली व्यक्ति समय और सम्यक् समझ— दोनों का सदुपयोग करते हुए अध्यात्म का मार्ग अपनाता है, वही भवसागर से पार होने का वास्तविक पुरुषार्थ कर पाता है।
प्रवचन के अंत में आचार्य श्री ने सभी श्रद्धालुओं को जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करते हुए धर्म, आत्मचिंतन और अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





