नशा नहीं, आत्मसंयम बनाइए अपनी ताकत; इतने मजबूत बनें कि व्यसन कभी आपकी कमजोरी न बने : अंतर्मना आचार्य प्रसन्नसागरजी महाराज
पुष्पगिरी (सोनकच्छ)।
“इतने कमजोर भी मत बनो कि नशा आपका जीना हराम कर दे, बल्कि इतने मजबूत बनो कि नशा कभी आपकी कमजोरी ही न बन पाए।” यह प्रेरणादायी संदेश अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्नसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया। उन्होंने नशामुक्त जीवन, पारिवारिक संस्कार, आत्मसंयम और नैतिक मूल्यों पर ओजस्वी उद्बोधन देते हुए समाज से व्यसनों का पूर्णतः त्याग करने का आह्वान किया।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके धन, पद या बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रेष्ठ संस्कार और सदाचार में निहित होती है। जिस व्यक्ति ने अपने मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली, वही सच्चे अर्थों में सफल और शक्तिशाली कहलाता है।
अपने प्रवचन में उन्होंने एक प्रेरक दृष्टांत सुनाते हुए बताया कि एक व्यक्ति लंबे समय से सर्दी-जुकाम से परेशान था। अनेक उपचारों के बाद भी लाभ नहीं मिलने पर उसने अपने एक ज़मींदार मित्र से सलाह ली। मित्र ने व्यंग्य करते हुए कहा कि प्रतिदिन दो घूंट शराब पी लिया करो, जुकाम ठीक हो जाएगा। जब उसने आश्चर्य व्यक्त किया तो ज़मींदार मुस्कराते हुए बोला, “शराब ने मेरी ठकुराई और ज़मींदारी तक छीन ली, तो तुम्हारा छोटा-सा जुकाम भी ले जाएगी।” इस प्रसंग के माध्यम से आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि शराब या अन्य नशीले पदार्थ किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि स्वयं सबसे बड़ी समस्या हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में जितने लोग समुद्र, नदी और सागर में डूबकर नहीं मरे, उससे कहीं अधिक लोगों का जीवन शराब और अन्य नशीले पदार्थों ने बर्बाद कर दिया है। व्यसन केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि परिवार की खुशियां, आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य को भी नष्ट कर देता है।
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि यदि वे अपने माता-पिता, परिवार, बच्चों और अपने जीवन से सच्चा प्रेम करते हैं तो स्वयं भी नशे से दूर रहें तथा समाज को व्यसनमुक्त बनाने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने हमें संस्कार, सम्मान और प्रतिष्ठा की जो अमूल्य विरासत सौंपी है, उसकी रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व है। यदि वर्तमान पीढ़ी अपने कर्तव्यों के प्रति सजग नहीं रही तो आने वाली पीढ़ियां उसे कभी क्षमा नहीं करेंगी।
अपने उद्बोधन के अंत में आचार्य श्री ने सभी श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करने का आग्रह करते हुए कहा, “जो नाम, सम्मान और संस्कार हमें अपने बुजुर्गों से विरासत में मिले हैं, क्या हम उन्हें उसी गरिमा के साथ अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपने के लिए तैयार हैं?”
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने नशामुक्त, संस्कारयुक्त एवं संयममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद)
जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।




