जब गुरु विराजते हैं, तब खुलते हैं श्रद्धा के दरबार — चातुर्मास में भामाशाहों की समर्पण परंपरा का आध्यात्मिक संदेश
इंदौर
इंदौर में निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर महाराज के सान्निध्य में आयोजित चातुर्मास मंगल कलश स्थापना महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि वह गुरु-भक्ति, त्याग और दान की भारतीय संस्कृति का जीवंत दर्शन बन गया। जब समाज के भामाशाहों ने बढ़-चढ़कर कलश, सेवा और विभिन्न धार्मिक दायित्वों के लिए अपने “दरबार खोल दिए”, तब यह स्पष्ट हो गया कि जैन समाज में गुरु के प्रति श्रद्धा आज भी उतनी ही प्रगाढ़ है जितनी प्राचीन काल में थी।
भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि जहाँ संतों का चरण पड़ता है, वहाँ केवल धर्म नहीं आता, बल्कि सौभाग्य, संस्कार और आत्मकल्याण का मार्ग भी प्रशस्त होता है। चातुर्मास का अवसर इसी आध्यात्मिक साधना का पर्व है। चार महीनों तक संतों का एक स्थान पर विराजना समाज के लिए आत्ममंथन, संयम, स्वाध्याय और सेवा का दुर्लभ अवसर होता है।
भामाशाहों द्वारा लाखों करोड़ो रुपये की बोलियाँ लगाना केवल आर्थिक सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं है। यह उस भावना का प्रतीक है कि धन तभी सार्थक है, जब वह धर्म की धारा में प्रवाहित हो। जैन दर्शन में दान को चार प्रमुख दानों में स्थान दिया गया है, और गुरु की सेवा, चातुर्मास की व्यवस्था और धर्म प्रभावना में लगाया गया प्रत्येक अंश अनंत पुण्य का कारण माना गया ।
इतिहास साक्षी है कि जैन समाज ने सदैव मंदिर, तीर्थ, गुरुकुल, गौशालाएँ, चिकित्सालय और धर्मशालाएँ बनाकर समाज को नई दिशा दी है। यही कारण है कि जैन समाज के भामाशाह केवल धनवान नहीं, बल्कि धर्मवान भी कहलाते हैं। उनका वैभव समाज के उत्थान और धर्म की प्रभावना में समर्पित रहता है।
निर्यापक श्रमण मुनिश्री सुधासागर महाराज का चातुर्मास इंदौर के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनने जा रहा है। आने वाले चार महीनों में प्रवचन, स्वाध्याय, तप, आराधना, संस्कार और आत्मजागरण के अनेक आयाम खुलेंगे। ऐसे में जो श्रद्धालु आज सेवा का अवसर प्राप्त कर रहे हैं, वे वास्तव में केवल आयोजन के सहभागी नहीं, बल्कि धर्म इतिहास के सह-निर्माता बन रहे हैं।
आज के भौतिकवादी युग में जब व्यक्ति धन को अपनी पहचान मान बैठा है, तब जैन समाज के भामाशाह यह संदेश देते हैं कि धन की वास्तविक महिमा संग्रह में नहीं, समर्पण में है; तिजोरी में नहीं, तीर्थ और गुरुचरणों में है।
इंदौर का यह चातुर्मास आने वाली पीढ़ियों को भी यह प्रेरणा देगा कि गुरु के चरणों में समर्पित किया गया प्रत्येक अर्पण केवल एक दान नहीं, बल्कि आत्मा की उन्नति का सेतु है। यही जैन संस्कृति की सनातन परंपरा है, यही भामाशाहों की अमर पहचान है और यही धर्म की वास्तविक समृद्धि है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

