मन मंदिर में नहीं, मंडी में भटकता है; सुख और शांति बाहर नहीं, अपने भीतर खोजें : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

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मन मंदिर में नहीं, मंडी में भटकता है; सुख और शांति बाहर नहीं, अपने भीतर खोजें : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

 

पुष्पगिरी सोनकच्छ में गुरु भक्तों को दिया आत्मचिंतन का संदेश, कहा— परिग्रह और अति-परिचय मन की शांति के सबसे बड़े बाधक

 

पुष्पगिरी (सोनकच्छ)।

“अपने भीतर प्रेम, प्रसन्नता, सुख, शांति और आनंद को खोजना आसान नहीं है, लेकिन इन्हें बाहर खोजना तो बिल्कुल भी संभव नहीं है।” यह प्रेरक उद्बोधन अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए दिया।

 

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य का मन विचारों का पुलिंदा है। मन की चंचलता का सबसे बड़ा कारण अति-परिचय और परिग्रह है। जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक संग्रह और संबंधों में अत्यधिक उलझ जाता है, तब उसके भीतर विचारों और विकल्पों का तूफान उठने लगता है, जिससे मन अशांत और व्याकुल हो जाता है।

 

उन्होंने कहा कि आवश्यकता से अधिक संग्रह करना ही परिग्रह है। वास्तव में मन की अतृप्त भूख का दूसरा नाम परिग्रह है। मन स्वभाव से बहिर्मुखी और अधोगामी है, इसलिए वह सदैव बाहरी आकर्षणों की ओर दौड़ता रहता है।

 

आचार्य श्री ने मन के स्वभाव को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा—

 

“मन मंदिर में नहीं, मंडी में लगता है।

मन जाप में नहीं, पाप में लगता है।

मन शुभ में नहीं, अशुभ में लगता है।”

 

उन्होंने कहा कि मन और पानी दोनों का स्वभाव एक समान है। जैसे पानी ढलान की ओर बहता है, वैसे ही मन भी सहज रूप से निम्न प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित होता है। वह जीवन की ऊँचाइयों और आत्मानंद की गहराइयों को नहीं पहचानता, बल्कि भोग-विलास, कामना और वासना जैसी क्षणिक इच्छाओं में ही उलझा रहता है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि यदि मनुष्य इन्हीं आसक्तियों से सीख लेकर उन्हें आत्मजागरण का माध्यम बना ले, तो यही क्षुद्रता उसके उत्थान की सीढ़ी बन सकती है। इसका श्रेष्ठ उदाहरण गोस्वामी तुलसीदास हैं, जिन्होंने सांसारिक आसक्ति को ही आत्मोन्नति और ईश्वर भक्ति का माध्यम बना लिया।

 

धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के प्रेरणादायी विचारों को आत्मसात करते हुए आत्मचिंतन और संयममय जीवन का संकल्प लिया।

 

प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा, पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद)

जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी :::

 

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