आर्यिका 105श्री महायश मति जी ने केशलोचन किए
जयपुर आचार्य श्री108 वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज,20 आर्यिकाओं 01 ऐलक 4 क्षुल्लक क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित जयपुर चन्द्रप्रभ जिनालय चन्द्रपूरी बड़ के बालाजी में ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजित हैं आज अनेक श्रद्धालुओं के सामने श्री वर्धमान सागर जी की सुशिष्या आर्यिका 105 श्री महायशमति माताजी ने 21 मई गुरुवार को केशलोचन किया ।केशलोचन के बारे में संघ की आर्यिका105 श्री पूर्णिमा मति जी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 माह से 4 माह की अवधि के भीतर के केशलोचन करना अनिवार्य है।केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है । केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है बालों का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवो की उत्पत्ति होने की संभावना होती है जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं।राजेश पंचोलिया सुरेश सबलावत भागचंद चूड़ीवाल केअनुसार माताजी ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं केश लोच से शरीर से ममत्व दूर होता है केश लोचन के समय तप,संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं उस दिन उपवास करते हैं ।
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
