महापुरुषों के गुणों का अनुकरण ही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग : निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज

धर्म

महापुरुषों के गुणों का अनुकरण ही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग : निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज

सिद्धचक्र महामंडल विधान के समापन पर 1024 अर्घ्य समर्पित, निष्काम आराधना और शुद्ध भावों से धर्म साधना का दिया संदेश

सागर।
महापुरुषों के आदर्शों को जीवन में उतारना ही आत्मकल्याण का वास्तविक मार्ग है। धर्म का उद्देश्य सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि जन्म-मरण के अनंत चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। यह प्रेरणादायी संदेश निर्यापक मुनिश्री 108 अभय सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिया।मुनिश्री ने कहा कि महापुरुषों के गुणों का चिंतन और अनुकरण मनुष्य के जीवन को सही दिशा प्रदान करता है। उनके आदर्श हमें बताते हैं कि हमारा आचरण कैसा हो और धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है। उन्होंने कहा कि यद्यपि वर्तमान में भगवान प्रत्यक्ष रूप से हमारे बीच नहीं हैं, किंतु जिनवाणी के माध्यम से हम आज भी उनके दिव्य संदेश से जुड़े हुए हैं। गुरु के श्रीचरणों तक पहुँचकर ही धर्म का सही मार्ग प्राप्त होता है।

 

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय समाज का सौभाग्य है कि आचार्य भगवंतों की अनुकंपा से नगर-नगर में साधु-संतों का सान्निध्य और धर्मश्रवण का दुर्लभ अवसर सहज उपलब्ध हो रहा है। आचार्य श्री शांतिसागर महाराज का स्मरण करते हुए मुनिश्री ने बताया कि उस समय ध्वनि विस्तारक यंत्र जैसी आधुनिक सुविधाएँ नहीं थीं, फिर भी उन्होंने अपनी अद्भुत व्यवस्था और तपबल से अनेक मुनिराजों को प्रवचन के लिए प्रेरित किया तथा धर्म प्रचार के माध्यम से असंख्य जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने एक जिज्ञासु और उसके गुरु के संवाद का उल्लेख करते हुए आचार्य कुंदकुंद स्वामी के सिद्धांतों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रति श्रद्धा, विश्वास और रुचि होने के बावजूद यदि साधना के पीछे शुद्ध भाव नहीं हैं, तो उसका अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता। आज अधिकांश लोग धर्म का आश्रय सांसारिक सुख-सुविधाओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए लेते हैं, जबकि धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मा का कल्याण और संसार की अनंत यात्रा का अंत करना है।मुनिश्री ने स्पष्ट कहा कि भगवान जिनेंद्र की आराधना से पुण्य का उदय अवश्य होता है और समय आने पर इच्छित फल भी प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन धर्म को कभी लेन-देन या सौदे की भावना से नहीं करना चाहिए। निष्काम भाव, निर्मल श्रद्धा और शुद्ध अंतःकरण से की गई आराधना ही आत्मकल्याण का द्वार खोलती है।प्रवचन के उपरांत आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतिम दिवस श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ 1024 अर्घ्य समर्पित कर विश्वशांति, आत्मकल्याण और धर्म प्रभावना की मंगलकामना की।

— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312

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