संस्कार बदलेंगे तो बदलेगा जीवन, सम्यक दृष्टि ही आत्मकल्याण और मोक्ष का प्रथम द्वार : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज

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संस्कार बदलेंगे तो बदलेगा जीवन, सम्यक दृष्टि ही आत्मकल्याण और मोक्ष का प्रथम द्वार : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज

कोटा, 23 जुलाई। 

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित अष्टान्हिका महापर्व एवं नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव के तृतीय दिवस श्रद्धा, भक्ति, आराधना एवं आध्यात्मिक साधना का अद्भुत संगम देखने को मिला। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, भक्तिभाव और जिनवाणी की मंगलध्वनि से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने विधान, अभिषेक, पूजन एवं अर्घ्य समर्पण कर आत्मशुद्धि, विश्वशांति एवं समस्त जीवों के मंगल की कामना की।

 

 

 

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि प्रातःकाल मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान के साथ सिद्धचक्र महामंडल विधान सम्पन्न हुआ, जिसमें महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ सहभागिता कर आत्मकल्याण का पुण्य अर्जित किया।

 

सम्यक दृष्टि ही मोक्षमार्ग का प्रथम द्वार

विधान समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने संस्कार, सम्यक दर्शन और आत्मकल्याण पर आधारित ओजस्वी प्रवचन देते हुए कहा कि जीव अपने कर्मों और संस्कारों के अनुसार अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। यदि मनुष्य अपने परिणामों का आत्मनिरीक्षण कर सम्यक दृष्टि, सदाचार और धर्ममय जीवन को अपनाए, तो उसके लिए मोक्षमार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।

 

 

 

 

मुनिश्री ने कहा कि संसार में अनंत जीव हैं, किंतु प्रत्येक जीव के संस्कार, भाव और परिणाम भिन्न-भिन्न हैं। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, श्रावकत्व और श्रमणत्व आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा के चार महत्वपूर्ण सोपान हैं। मिथ्या दृष्टि वाला व्यक्ति सत्य और असत्य का विवेक खो देता है, जबकि सम्यक दृष्टि से युक्त व्यक्ति धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होता है।

मर्यादा की रक्षा ही धर्म का स्वरूप है।

 

 

 

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मुनिश्री ने कहा कि श्रीराम और रावण का युद्ध व्यक्तिगत प्रतिशोध का नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, वचन और मर्यादा की रक्षा का युद्ध था। सम्यक दृष्टि कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं करती, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना के लिए आवश्यक कर्तव्य का पालन करना सिखाती है।

उन्होंने कहा कि श्रावक का जीवन त्याग, संयम और सदाचार की ओर अग्रसर होता है, जबकि श्रमण अवस्था में ‘न तेरा, न मेरा’ का भाव पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है। मनुष्य जीवन भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि कर्मों के क्षय, आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति के लिए प्राप्त हुआ है।

 

 

 

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि अष्टान्हिका महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, विवेक, सद्भाव और संस्कारों के परिष्कार का महापर्व है। यदि मनुष्य अपने भीतर के दोषों का त्याग कर सद्गुणों को धारण कर ले, तो उसका जीवन स्वतः मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है।

 

 

 

अपने संस्कार बदलो, परिणाम स्वयं बदल जाएंगे

समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि अपने प्रेरक प्रवचनों में क्षुल्लक संयम सागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य के सामने अच्छे और बुरे—दोनों प्रकार के संस्कार सदैव उपस्थित रहते हैं। बुरे संस्कार जीव को संसार के बंधनों में उलझाते हैं, जबकि संतों का सान्निध्य और धर्म का मार्ग आत्ममुक्ति की दिशा प्रदान करता है।

 

 

 

उन्होंने कहा कि जीवन में सदाचार, संयम, धर्म और आत्मानुशासन को अपनाना ही सच्ची साधना है।

प्रवचन के दौरान उन्होंने सल्लेखना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सल्लेखना केवल मृत्यु का व्रत नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन की साधना का सर्वोच्च संस्कार है। सल्लेखना का अधिकारी बनने के लिए व्रत, संयम, प्रतिमाओं का पालन तथा निरंतर आत्मशुद्धि आवश्यक है। मृत्यु का समय किसी को ज्ञात नहीं होता, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को आज से ही अपने अंतिम क्षणों को मंगलमय बनाने की तैयारी प्रारंभ कर देनी चाहिए।

तीसरे दिन श्रद्धा और भक्ति से सम्पन्न हुआ सिद्धचक्र विधान

मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के तृतीय दिवस 64 ऋद्धियों के अर्घ्य अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ समर्पित किए गए। श्रद्धालुओं ने विधिवत अभिषेक, पूजन, अर्घ्य समर्पण एवं मंगल आरती में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया। संपूर्ण मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जैन भक्ति गीतों और जयघोष से गुंजायमान रहा। विधान के माध्यम से विश्वशांति, आत्मकल्याण तथा समस्त जीवों के मंगल की मंगलकामना की गई।

आज के पुण्यार्जक

समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा नेहल के जन्मदिवस के पावन अवसर पर प्राप्त किया गया। साथ ही श्री सन्नी बगड़ा तथा श्री राजेन्द्र, श्री हुकम जैन ‘काका’ हरसोरा परिवार भी पुण्यार्जन में सहभागी बने।

 

 

भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री सन्नी बगड़ा द्वारा प्राप्त किया गया। वहीं श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन नेहल जी एवं सन्नी जी द्वारा श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक संपन्न किया गया।

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प्रवचन के प्रमुख संदेश

🔸 आत्मा अपने संस्कारों और कर्मों के अनुसार संसार में भ्रमण करती है।

🔸 मिथ्या दृष्टि बंधन का कारण है, जबकि सम्यक दृष्टि मोक्षमार्ग का प्रथम द्वार है।

🔸 मनुष्य जीवन भोग के लिए नहीं, बल्कि कर्मक्षय, आत्मचिंतन और पुरुषार्थ के लिए प्राप्त हुआ है।

🔸 श्रावक का लक्ष्य संयम और त्याग है, जबकि श्रमण का लक्ष्य पूर्ण वैराग्य और आत्ममुक्ति है।

🔸 श्रेष्ठ संस्कार संतों के सान्निध्य, स्वाध्याय और धर्मसाधना से विकसित होते हैं।

🔸 सल्लेखना मृत्यु का व्रत नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन की साधना का सर्वोच्च संस्कार है।

🔸 संस्कार बदलेंगे तो परिणाम बदलेंगे, और परिणाम बदलेंगे तो जीवन स्वयं दिव्यता की ओर अग्रसर हो जाएगा।

        संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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