मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मुनि श्री सुधासागर जी महाराज को दिया राजकीय अतिथि का दर्जाराजकीय सम्मान से बढ़कर है संतत्व की गरिमा, फिर भी समाज के लिए गौरव का क्षण

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मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मुनि श्री सुधासागर जी महाराज को दिया राजकीय अतिथि का दर्जाराजकीय सम्मान से बढ़कर है संतत्व की गरिमा, फिर भी समाज के लिए गौरव का क्षण
रामगंजमंडी

निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव 108 सुधासागर जी महाराज को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा राजकीय अतिथि का दर्जा प्रदान किया जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा, तप, त्याग और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति शासन की श्रद्धा का प्रतीक है। इस निर्णय से जैन समाज ही नहीं, बल्कि समूचा आध्यात्मिक जगत गौरवान्वित हुआ है।

 

संत किसी पद, सम्मान या विशेषाधिकार के मोहताज नहीं होते। उनका वास्तविक वैभव उनका तप, संयम, त्याग और आत्मसाधना होती है। निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव 108 सुधासागर जी महाराज भी ऐसे ही विरक्त संत हैं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, संस्कृति, तीर्थ संरक्षण, नैतिक जागरण और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया है। वे सदैव कहते रहे हैं कि व्यक्ति का सबसे बड़ा सम्मान उसका चरित्र और संयम है, न कि बाहरी उपाधियाँ।

 

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें राजकीय अतिथि का दर्जा दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि शासन भी उन संतों के योगदान को स्वीकार करता है, जिन्होंने समाज में सद्भाव, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का दीप प्रज्वलित किया है। यह सम्मान केवल एक संत का नहीं, बल्कि उन शाश्वत मूल्यों का सम्मान है जिन पर भारतीय संस्कृति की नींव टिकी हुई है।

 

सुधासागर जी महाराज ने देशभर में अनेक तीर्थों के निर्माण एवं जीर्णोद्धार, युवाओं में संस्कार जागरण, व्यसनमुक्ति, पर्यावरण संरक्षण तथा धार्मिक चेतना के विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनके प्रवचन केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले प्रेरक संदेश हैं।

 

यह भी सत्य है कि संत स्वयं कभी सम्मान की अपेक्षा नहीं रखते। वे तो समान भाव से सबका कल्याण चाहते हैं। किंतु जब समाज और शासन किसी संत के तप और लोककल्याणकारी कार्यों को नमन करते हैं, तब वह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को भी यह संदेश देता है कि त्याग, तपस्या और नैतिक जीवन आज भी सर्वोच्च आदर्श हैं।

 

मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय न केवल जैन समाज के लिए गौरव का विषय है, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक विरासत के प्रति सम्मान की एक प्रेरक मिसाल भी है। यह सम्मान संत और शासन के बीच संवाद, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक संदेश देता है।

 

निस्संदेह, संतों की महानता किसी राजकीय सम्मान से नहीं बढ़ती, किंतु जब राज्य संतत्व के आगे श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होता है, तब समाज का विश्वास धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के प्रति और अधिक सुदृढ़ होता है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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