पुण्य ही जीवन की वास्तविक संपदा, इसे व्यर्थ न जाने दें : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज
सिद्धचक्र महामंडल विधान में संयम, संकल्प और श्रद्धा का प्रेरक संदेश
अष्टाह्निका महापर्व पर पूजन के दौरान मोबाइल त्यागकर एकाग्र भाव से आराधना करने का आह्वान
कोटा, 21 जुलाई।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान के प्रथम दिवस आध्यात्मिक चेतना, पुण्य संचय, संयम एवं श्रद्धा से ओतप्रोत प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को आत्ममंथन और आत्मकल्याण का संदेश दिया। देशभर से पधारे श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति में मुनि संघ ने स्पष्ट किया कि मनुष्य के जीवन में प्राप्त होने वाला प्रत्येक शुभ अवसर उसके संचित पुण्यों का ही प्रतिफल होता है।

संघस्थ क्षुल्लक संयम सागर जी महाराज ने अपने प्रेरक प्रवचन में कहा कि संसार में मिलने वाली प्रत्येक शुभ उपलब्धि पुण्य के प्रभाव से ही संभव होती है। तपस्वी संतों का सान्निध्य, धर्मश्रवण, आराधना तथा जिनवाणी का लाभ भी पूर्व संचित पुण्यों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुण्यों का सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि यही वास्तविक जीवन-संपदा है। यदि पुण्य का सदुपयोग नहीं किया गया, तो उसका क्षय हो जाता है और दुर्लभ अवसर हाथ से निकल जाते हैं।

दृढ़ संकल्प बदल सकता है भाग्य
निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कर्म सिद्धांत की गहन एवं सरल व्याख्या करते हुए कहा कि कर्मों का उदय इतना प्रभावशाली होता है कि वह बड़े-बड़े तपस्वियों के मार्ग में भी अंतराय उत्पन्न कर सकता है। उन्होंने आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के साथ ऐलक अवस्था में हुए विहार के संस्मरण सुनाते हुए जयपुर में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव की प्रेरणादायी स्मृतियां साझा कीं।

मुनिश्री ने रानी मनोवती के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान के प्रति उनका गजमोती अर्पित करने का दृढ़ एवं निष्कलुष संकल्प ही उन्हें सुगति का कारण बना और वे देवों द्वारा भी पूजनीय बनीं। उन्होंने कहा कि यदि संकल्प पवित्र, श्रद्धापूर्ण और अडिग हो, तो साधारण पुष्प भी गजमोती के समान अमूल्य बन जाते हैं। वास्तविक आराधना बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और श्रद्धा से होती है।
एकाग्रता से ही सफल होती है आराधना
अष्टाह्निका महापर्व के प्रथम दिवस मुनिश्री ने सिद्ध परमेष्ठियों की आराधना का महत्व बताते हुए कहा कि पूजन केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का दिव्य साधन है। यदि पूजन में केवल पूजा का भाव रहेगा तो विपुल पुण्य का संचय होगा, और यदि उसमें परपदार्थ त्याग, आत्मचिंतन तथा आत्मकल्याण की भावना जुड़ जाए, तो वही आराधना साधक को भगवानत्व की दिशा में अग्रसर कर देती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से विशेष आग्रह करते हुए कहा कि पूजन के समय मोबाइल फोन का पूर्णतः त्याग करें। आराधना के प्रत्येक क्षण में मन, वचन और भाव केवल भगवान की भक्ति में केंद्रित रहें। पूजा के दौरान मोबाइल का उपयोग साधना की एकाग्रता को भंग करता है। उनके इस प्रेरक संदेश को उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक स्वीकार करते हुए जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
ध्वजारोहण एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न
सिद्धचक्र महामंडल विधान के शुभारंभ अवसर पर ध्वजारोहण का पुण्यार्जन श्री पदम ज श्री राजेन्द्र , श्री हुकम ‘काका’ एवं श्री प्रकाश हरसोरा परिवार द्वारा किया गया।
दीप प्रज्वलन का सौभाग्य श्री महावीर भारती एवं श्री सिद्धार्थ जी मित्तल परिवार को प्राप्त हुआ।
कुबेर इन्द्र बनने का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला , श्री विवेक जी तथा समस्त ठोरा परिवार (संधारा वाले) द्वारा प्राप्त किया गया, जबकि श्रीपाल एवं मैना सुंदरी बनने का पुण्यार्जन श्री पारस जी एवं श्रीमती सुशीला जी गर्ग परिवार को प्राप्त हुआ।
28 जुलाई तक होंगे विविध धार्मिक आयोजन
मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन 28 जुलाई तक प्रतिदिन विविध धार्मिक अनुष्ठानों, पूजन, अभिषेक, प्रवचन एवं आराधना के साथ संपन्न होगा। उन्होंने समस्त श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्माराधना एवं पुण्य लाभ अर्जित करने का आग्रह किया।
विधान समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने कहा कि यह आयोजन प्रत्येक श्रद्धालु के लिए आत्मकल्याण का दुर्लभ अवसर है। सभी समाजबंधु अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करें।
समिति महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा, श्रावक श्रेष्ठी तथा शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती रतनबाई, श्री जम्बू जैन सर्राफ, श्रीमती अर्चना सर्राफ, अभिमन्यु, दीपांशी, दिव्यांश एवं मुस्कान जैन सर्राफ परिवार द्वारा दिव्यांश के जन्मदिवस के पावन उपलक्ष्य में किया गया। साथ ही इस पुण्यार्जन में श्री महावीर जी भारती, श्री सिद्धार्थ जी मित्तल तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार भी सहभागी बने।
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गुरुवाणी के प्रमुख संदेश
🔸 पुण्य ही जीवन की वास्तविक संपदा है — धन-संपत्ति नश्वर है, किंतु पुण्य ही जीवन का सबसे बड़ा धन है।
🔸 हर शुभ अवसर पुण्य का परिणाम है — संतों का सान्निध्य, धर्मश्रवण और आराधना का अवसर पूर्व जन्मों के पुण्यों से ही प्राप्त होता है।
🔸 दृढ़ संकल्प बदल देता है भाग्य — निर्मल भावना और अटल श्रद्धा साधारण साधनों को भी महान बना देती है।
🔸 पूजन में एकाग्रता आवश्यक है — पूजा केवल क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की साधना है।
🔸 पूजन के समय मोबाइल का त्याग करें — आराधना के दौरान मन, वचन और भाव केवल भगवान में एकाग्र रखें।
🔸 कर्मों का सिद्धांत अटल है — शुभ कर्म सुख और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
🔸 आत्मकल्याण ही जीवन का परम लक्ष्य है — धर्म, संयम और श्रद्धा से ही आत्मा का वास्तविक उत्थान संभव है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
