*गोयल नगर में अष्टाह्निका महापर्व का शुभारंभ, आचार्य श्री सुनील सागर जी का केशलोंच संपन्न*
21 जुलाई, गोयल नगर इंदौर।
चिंता नहीं, चिंतामणि की आराधना करें — आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज
गोयल नगर स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में पावन अष्टाह्निका महापर्व के प्रथम दिवस पर आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में नंदीश्वर द्वीप की आराधना, सिद्ध भगवानों की भक्ति तथा केशलोंच का अत्यंत श्रद्धामय आयोजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने अर्घ्य समर्पित कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
अपने मंगल प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि दुनिया की चिंता करने वाला कभी चिंतामणि नहीं बनता, जो अपनी आत्मा की चिंता करता है वही चिंतामणि बनता है। जब तक मन में चिंता है, तब तक तत्त्वज्ञान का वास्तविक अनुभव नहीं हो सकता। जो निश्चिंत होकर आत्मस्वरूप का चिंतन करता है, वही तत्त्वज्ञानी बनता है। परम वीतराग मुनिराज वन में जाकर आत्मध्यान करते हैं और साधना की सिद्धता प्राप्त कर सिद्ध भगवान बन जाते हैं।

आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य दूसरों के बारे में अधिक सोचता है, जबकि भगवान केवल आत्मस्वरूप में स्थित रहते हैं। यदि मनुष्य भी भगवान की तरह वीतराग बनने का प्रयास करे तो भगवान बनने का मार्ग दूर नहीं है। भगवान जिनेन्द्र के गुणों को समझकर और उनके बताए मार्ग पर चलकर ही आत्मकल्याण संभव है।
उन्होंने नंदीश्वर द्वीप की महिमा बताते हुए कहा कि सौधर्म इन्द्र एवं देवगण अष्टाह्निका पर्व के अवसर पर नंदीश्वर द्वीप जाकर 52 जिनालयों में विराजमान 108-108 जिनप्रतिमाओं की पूजा-अर्चना करते हैं। हम वहाँ प्रत्यक्ष नहीं जा सकते, इसलिए शास्त्रों की परंपरा के अनुसार पृथ्वी पर नंदीश्वर द्वीप की रचना कर उसी भाव से आराधना करते हैं। ऐसी निर्मल भावना से की गई भक्ति भविष्य में वास्तविक नंदीश्वर द्वीप के दर्शन का भी कारण बनती है।
आचार्य श्री ने धर्म की तुलना वर्षा ऋतु से करते हुए कहा कि जैसे किसान वर्षा आने पर खेत में बीज बोता है और समय आने पर वही बीज फल देता है, उसी प्रकार यह धर्म, ध्यान, पुण्य और दान के बीज बोने का समय है। जिनवाणी रूपी अमृतवर्षा में यदि मनरूपी भूमि को उर्वर बनाया जाए तो भविष्य में उसका फल आत्मिक आनंद और शाश्वत सुख के रूप में अवश्य प्राप्त होता है। आज भले ही व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ दिखाई देता हो, किंतु मानसिक शांति सभी के पास हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए यदि वास्तविक सुख और शांति चाहिए तो जगतत्राता भगवान की भक्ति कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विदेशों में भी अनेक श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर देवदर्शन के लिए पहुँचते हैं। जो श्रद्धापूर्वक तीर्थों की वंदना और जिनालयों के दर्शन करता है, उसे ऐसा पुण्य और सामर्थ्य प्राप्त होता है कि भविष्य में नंदीश्वर द्वीप के दर्शन का भी सौभाग्य मिलता है।
इस अवसर पर गोयल नगर स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में अष्टाह्निका महापर्व के प्रथम दिन आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज का केशलोंच भी संपन्न हुआ। साथ ही संघस्थ मुनिश्री समप्रज्ञ सागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री का भी केशलोंच संपन्न हुआ।
केशलोंच जैन मुनि जीवन की कठोर तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है। इसमें मुनिराज अपने सिर के बालों का स्वयं हाथों से त्याग करते हैं और इस दिन पूर्ण रूप से उपवास होता है ना कुछ खाना, ना कुछ पीना। यह शरीर के प्रति आसक्ति छोड़ने, परिषहों को समभाव से सहन करने तथा आत्मसाधना में दृढ़ रहने का प्रेरक तप माना जाता है। यह तप त्याग, संयम और वीतरागता का अनुपम उदाहरण है।
महापर्व के अंतर्गत आगामी आठ दिनों तक श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, गोयल नगर में नंदीश्वर द्वीप की आराधना, सिद्ध भगवानों की पूजा एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धाभाव के साथ संपन्न होंगे।
माही जैन धीरावत से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312




