“सिद्धचक्र महामंडल विधान श्रद्धा,शुद्धि,सदबुद्धि औरसिद्धि का महापर्व है- राष्ट्रसंत मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज”
मधुबन (गिरिडीह)।
गुणायतन में विराजमान राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज एवंमुनि श्री संधान सागर महाराज ससंघ केपावन सान्निध्य में नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ ध्वजारोहण,मंडप उद्घाटन के साथ श्रद्धा और उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर आयोजित इस भव्य विधान में देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने 108 मंडलों के साथ आराधना प्रारंभ की।
विधान के प्रथम दिवस राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान श्रद्धा, शुद्धि, समृद्धि और सिद्धि की साधना का महापर्व है। यह केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मजागरण औरआत्मपरिवर्तन का श्रेष्ठ माध्यम है।उन्होंने कहा कि इस विधान में अंधश्रद्धा नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण श्रद्धा आवश्यक है।अनेक लोग सांसारिक सफलता,समृद्धि और बाधाओं के निवारण की भावना से श्री सिद्धचक्र विधान करते हैं, किंतु वास्तविक उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और जीवन का रूपांतरण होना चाहिए।विधान का प्रभाव इस बात से नहीं आँका जाता कि हमारे पास कितना वैभव, कितनी सुंदर सामग्री या कितना भव्य मंडप है, बल्कि इससे कि इस आराधना के माध्यम से हमारे जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया।

मुनिश्री ने कहा कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में पंचपरमेष्ठी एवं नव देवताओं की आराधना की जाती है।सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र औरतप जैसे गुण ही मोक्षमार्ग के आधार हैं।यदि ये गुण जीवन में विकसित हो जाएँ तो यही आराधना साधक को सिद्धि के मार्ग पर अग्रसर करती है। उन्होंने कहा कि भगवान से धन, वैभव या सांसारिक सुविधाएँ माँगने के स्थान पर सदबुद्धि माँगनी चाहिए। यदि सदबुद्धि बनी रहेगी तो जीवन के सभी कार्य अपने आप सफल होते चले जाएंगे। सद्बुद्धि के अभाव में कोई भी उपलब्धि स्थायी नहीं रह सकती। उन्होंने कहा कि जिसके हृदय में श्रद्धा, अंतरमन में शुद्धि और बुद्धि में सद्विवेक होता है,उसकी सिद्धि निश्चित होती है। श्रद्धा सम्यक दर्शन का, शुद्धि सम्यक चरित्र का और सद्बुद्धि सम्यक ज्ञान का प्रतीक है। इन तीनों का समन्वय ही जीवन को सिद्धि तक पहुँचाता है।
उन्होंने ध्वजारोहण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक धार्मिक आयोजन का शुभारंभ ध्वजारोहण से इसलिए किया जाता है, क्योंकि वह यह संदेश देता है कि जीवन में धर्म को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।ध्वज चारों दिशाओं से आने वाली हवा के साथ लहराता है, लेकिन उसका ध्वजदंड सदैव सीधा और अटल रहता है। यह हमें प्रेरणा देता है कि “संसार की परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा कभी डगमगानी नहीं चाहिए।”
उन्होंने बचपन का एक सरल उदाहरण देते हुए कहा कि बच्चे खंभे को पकड़कर उसके चारों ओर कितने भी चक्कर लगा लें, जब तक खंभा नहीं छोड़ते, वे गिरते नहीं हैं। उसी प्रकार मनुष्य संसार के कितने भी कार्य करे, कितनी भी व्यस्तता या कठिनाइयों से गुज़रे, यदि वह धर्मरूपी खंभे को मजबूती से पकड़े रहेगा, तो कभी विचलित नहीं होगा।मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि विधान के दौरान भावों की शुद्धि बनाए रखें। यदि प्रारंभिक दिनों में व्यवस्था में कहीं थोड़ी असुविधा या विलंब हो जाए तो उसे सहजता से स्वीकार करें। उन्होंने कहा, “पहली रोटी कभी-कभी कच्ची रह जाती है, लेकिन बाद की सारी रोटियाँ अच्छी बनती हैं।” इसलिए धैर्य, सहयोग और प्रसन्नता के साथ विधान की आराधना करें तथा किसी भी प्रकार का मनोविकल्प या संक्लेश अपने मन में स्थान न दें।
मुनिश्री ने गुणायतन एवं श्री सेवायतन की पूरी टीम तथा सभी स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा कि इस विराट आयोजन की सफलता सामूहिक समर्पण का ही परिणाम है। सभी कार्यकर्ता सेवा-भाव से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए व्यवस्था को उत्कृष्ट बनाने में लगें यदि प्रथम दिवस कोई कमी रह गई हो तो उसे आगामी दिनों में दूर करें जिससे किसी कोई कमी न रहे।
उन्होंने गुणायतन की व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए कहा कि अनेक कार्यकर्ता दिन-रात परिश्रम कर श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सेवा में जुटे हुए हैं। ऐसे सभी सेवाभावी कार्यकर्ता साधुवाद और आशीर्वाद के पात्र हैं। उन्होंने ध्वजारोहण, मंडप उद्घाटन तथा विधान की विभिन्न धार्मिक सेवाओं का सौभाग्य प्राप्त करने वाले सभी परिवारों एवं समर्पित स्वयंसेवकों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
मुनिश्री ने विश्वास व्यक्त किया कि जो श्रद्धालु श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का संकल्प लेकर गुणायतन पहुँचे हैं, वे पूरे उत्साह, श्रद्धा और भक्ति के साथ नौ दिवसीय आराधना को सफल बनाएँगे। वहीं जो श्रद्धालु किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो सके हैं, वे भी अपने-अपने स्थानों पर श्रद्धापूर्वक आराधना कर इस आध्यात्मिक महापर्व से जुड़ेंगे।
प्रवचन के उपरांत मुनिश्री के मंगल निर्देशन में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की विधिवत आराधना प्रारंभ हुई। अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर संपूर्ण गुणायतन परिसर सिद्धचक्र महामंडल विधान के मंत्रोच्चार, भक्ति, श्रद्धा एवं आध्यात्मिक उल्लास से गुंजायमान हो उठा। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, गुजरात सहित देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से आए बड़ी संख्या में श्रद्धालु, समाज के गणमान्यजन एवं धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया विधान के दूसरे दिवस 16 अर्घ समर्पित किये जायेंगे विधान 7:30 बजे सिद्ध भक्ती के साथ किया जायेगा
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





