स्मृति विशेष: आज की साइंस ने अहिंसा’ ने करुणा को समाप्त कर दिया – 2014 में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की चेतावनी आज हो रही सत्य सिद्ध
विदिशा चातुर्मास (2014) के ऐतिहासिक प्रवचनों की प्रासंगिकता आज और भी बढ़ी, दया-करुणा आधारित शिक्षा पर दिया था विशेष बल
विदिशा।
दिगम्बर जैनाचार्य, युगद्रष्टा परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने वर्ष 2014 के विदिशा चातुर्मास के दौरान अपने प्रवचनों में जो चिंतन समाज के समक्ष रखा था, वह आज के परिवेश में अक्षरशः सत्य प्रतीत हो रहा है। उन्होंने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान की अंधी दौड़ पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि “आज की साइंस ऑफ़ अहिंसा ने उस अहिंसा को लगभग समाप्त कर दिया है, जो भारतीय शिक्षा पद्धति की आत्मा थी।”
आचार्य श्री ने कहा था कि भारतीय संस्कृति की पहचान रही दया, करुणा और अनुकंपा से ओत-प्रोत कथाएं आज धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। समाज में तकनीकी प्रगति तो हुई है, लेकिन मानवीय संवेदनाएं कमजोर पड़ती जा रही हैं। इसलिए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता दया और करुणा के क्षेत्र में गंभीर कार्य करने की है।
उन्होंने कहा कि केवल राजा होना पर्याप्त नहीं है, सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा की भावनाओं और प्रत्येक जीव की सत्ता को समझे। हर जीव को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है और उसके अस्तित्व का सम्मान करना ही वास्तविक मानवता है।
आचार्य श्री ने उस समय उच्च न्यायालय की एक टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा था कि “हमने शिक्षा का विस्तार तो बहुत किया है, लेकिन नागरिकों को खोते जा रहे हैं।” उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि महाविद्यालय खोले जा रहे हैं तो उनके साथ ऐसी ‘नागरिकता की पाठशालाएं’ भी खुलनी चाहिए, जहां दया, करुणा, अनुकंपा और मानवीय मूल्यों का संस्कार दिया जाए।
उन्होंने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा था कि “ज्ञान की आरती उतारने के लिए दीपक चाहिए, लेकिन दया की आरती उतारने के लिए स्वयं को देखना पड़ता है।” जब तक हम दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक अपने अस्तित्व का भी सही अर्थ नहीं समझ पाएंगे।
आचार्य श्री ने करुणा का सरल संदेश देते हुए कहा था कि “नीचे देखकर चलने का अर्थ केवल सावधानी नहीं, बल्कि नीचे रहने वाले सूक्ष्म जीवों की रक्षा का भाव है।” यही अहिंसा और करुणा की वास्तविक साधना है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दया का पालन करता है, उसके जीवन में रिद्धियां और सिद्धियां स्वतः प्राप्त होने लगती हैं।
आज जब समाज आधुनिकता और तकनीकी विकास की दौड़ में मानवीय संवेदनाओं से दूर होता दिखाई दे रहा है, तब आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के ये विचार केवल एक प्रवचन नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए एक अमूल्य मार्गदर्शन और चेतावनी के रूप में हमारे सामने खड़े हैं।
— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312





