जिनवाणी भगवान की वाणी है इसके संरक्षण से बड़ा पुण्य कोई नहीं है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

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जिनवाणी भगवान की वाणी है इसके संरक्षण से बड़ा पुण्य कोई नहीं है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

 

श्रुत संरक्षण वात्सल्य दिवस पर आचार्य श्री वर्धमान सागर ने प्रवचन में बताया कि भगवान की वाणी जिनवाणी होती है माता-पिता बच्चन का जीवन संवारती है हम आधुनिकता के कारण पिछड़ रहे हैं भगवान की वाणी को जिनवाणी की उपेक्षा कर नए-नए शास्त्रों की रचना हो रही है आचार्य श्री शांति सागर जी की प्रेरणा से जिनवाणी को ताम्र पत्रों में अंकित कराकर तीन नगरों के मंदिर में विराजित किया गया। वर्षों पूर्व जब हम कर्नाटक गए थे अनेक स्थान पर हमने प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों एवं ताड़ पत्रों के ग्रंथों को देखा उनकी स्थिति बहुत ही जर्जर दयनीय लगी अनेक कीड़ों और अन्य दीमक मौसम कारण प्राचीन ग्रन्थ नष्ट हो रहे हैं हमने हमारी पीड़ा से अनिल जी सेठी बेंगलुरु को बता कर इस दिशा में कार्य करने का आदेश ओर प्रेरणा दी।आचार्य श्री शांति सागर फाउंडेशन का गठन हुआ। राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि टूटी फूटी इमारत को ,मंदिर को, प्रतिमाएं टूटने पर खंडित होने पर दोबारा बन जाती है ,किंतु प्राचीन जिनवाणी नष्ट होने पर उसका दोबारा निर्माण हो नहीं सकता।प्राचीन हस्तलिखित ताड़ पत्रों को आधुनिक तरीके से दक्षिण भारत के अनेक नगरों में संरक्षित करने का कार्य आधुनिक तरीके से प्रशिक्षित टीम द्वारा किया जा रहा है अभी तक जैसा बताया गया है 250000 ताड़ पत्रों को सुरक्षित किया गया है देश में करोड़ों ताड़ पत्र हस्तलिखित ग्रंथ अभी भी है जिन्हें सुरक्षा की बहुत जरूरत है इतिहास सभी जानते हैं कि वर्षों पूर्व जैन शास्त्रों की अनेक नगरों में होली जलाई गई उन शास्त्रों की संख्या इतनी थी कि 6 माह तक शास्त्र जलते रहे ।मां जिनवाणी सुरक्षित है तो जैन शासन सुरक्षित हैप्राचीन जिनवाणी को सुरक्षित करने के लिए सभी को अपना योगदान देना चाहिए।मूड बद्री दक्षिण की जैन काशी है वहां भी अनेक ग्रंथ है जिनवाणी माता है इसके समान व्यक्तित्व नहीं है मनुष्य जीवन तभी सार्थक होगा जब हम जिनवाणी का संरक्षण करें ।धन के दो ही उपयोग होते हैं या सदुपयोग होता है या दुरुपयोग होता है इसलिए अर्जित धन से देव शास्त्र गुरु का संरक्षण करना चाहिए सभी को जिनवाणी संरक्षण में योगदान देकर मनुष्य जीवन सार्थक करना चाहिए

आचार्य श्री के पूर्व मुनि श्री हितेन्द्र सागर जी ने बताया कि आज श्रुतसंरक्षण का दिवस है भगवान की वाणी, देशना को पूर्व आचार्य केवली गणधर स्वामी ने सुनकर अपनी याददाश्त के आधार पर जिनवाणी शास्त्रों की रचना की उन्हें ताड़ पत्रों पर इन ग्रंथो को लिपिबद्ध किया गया। बाद में हस्त लिखित ग्रन्थ की भी रचना हुई। सिद्धि भगवान की पूजा उपासना से नहीं होकर भगवान की वाणी जिनवाणी को सुरक्षित रखने से होती है

एक ग्वाले ने मुनिराज को जिनवाणी शास्त्र भेंट किया तो उसके पुण्य से वही ग्वाला अगले जन्मों में कुन्द कुन्द आचार्य हुए ,उन्होंने 48 पाहूड ग्रंथ लिखे इसी प्रकार जिनवाणी संरक्षित करने के लिए बहुत महत्व है शास्त्रों को सुरक्षित करना मंदिर निर्माण से ज्यादा पुण्यकारी है जिनवाणी की रक्षा के लिए निकलंक ने प्राणों की बाजी लगा दी।पुण्य आत्मा जीव ही जिनवाणी को सुरक्षित करते हैं सच्ची दोलत वही है जो जिनवाणी को संरक्षित करें जिनवाणी की कृपा से ही वर्तमान श्रमण परंपरा जीवित है क्योंकि आचार्य श्री शांति सागर जी ने सात गोड़ा के रूप में हस्तलिखित प्राचीन ग्रंथों के स्वाध्याय से वैराग्य धारण किया। आचार्य श्री शांति सागर फाउंडेशन के अध्यक्ष अनिल सेठी बेंगलुरु ने बताया कि मेरा पुण्य था कि आचार्य श्री के आशीर्वाद से मेरे साथियों का पुरुषार्थ रहा। अभी तक 250000 ताड़ पत्रों का संरक्षण आधुनिक तरीके से किया गया है दक्षिण भारत में 20 लाख से अधिक ताड़ पत्र है तथा पूरे देश में एक करोड़ से अधिक ताड़ पत्रों का संरक्षण होना बेहद जरूरी है। श्री सेठी ने बताया कि एक ताड़ पत्र की लागत 370 रुपए है 100 ताड़ पत्रों के एक ग्रंथ की लागत 37000 होती है 40 से अधिक प्रशिक्षित उच्च शिक्षा प्राप्त टीम द्वारा यह कार्य कुशलता पूर्वक किया जा रहा है सबसे महत्वपूर्ण बात यही है की मूल ताड़ पत्रों की स्कैनिंग कर उन्हें सुरक्षित रखा जाता है । समाज में जागरूकता बेहद जरूरी है।

इस अवसर पर आरके मार्बल ग्रुप के देश के प्रसिद्ध भामाशाह अशोक जी पाटनी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आपका यह कार्य सराहनीय है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के आशीर्वाद से यह कार्य हो रहा है और जरूर पूर्ण होगा इसमें जो भी सहयोग लगे मैं उसके लिए तैयार हूं। आचार्य श्री की प्रेरणा से सभा में अनेक श्रद्धालुओं ने दान राशि की स्वीकृति दी

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