बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरु नाम गुरु प्रातः स्मरणीय आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि के 103 वे मुनि दीक्षा दिवस भाव भीनी अभिव्यक्ति

श्री शांति वीर शिव धर्म अजीत वर्धमान सुर्रिभ्यो नमः
बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती गुरु नाम गुरु प्रातः स्मरणीय आचार्य श्री शान्तिसागर जी महामुनि के 103 वे मुनि दीक्षा दिवस मिति अनुसार फागुन शुक्ला 14 चतुर्दशी सोमवार सन 1920 से वर्ष 2023 मुनि दीक्षा दिवस पर कोटिशः नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।
एक परिचय
भोज ग्राम के श्रीमती सत्यवती देवी,एवम श्रीमान भीमगोड़ा पाटिल के यहां सन 1872 में 1008 श्री वासु पूज्य भगवान के गर्भ कल्याणक दिवसआषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत 1929 एक महामना का जन्म हुआ जिनका नाम सातगोंडा रखा गया।इनसे बड़े 2 भाई तथा एक भाई छोटा तथा एक बहन भी थी। इनके अंदर बचपन से ही धार्मिक संस्कार रहे जिसका परिणाम यह रहा की 18 वर्ष की उम्र में इन्होंने बिस्तर का त्याग कर दिया।

आजीवन ब्रहचर्य व्रत
संसार के चक्रव्यूह में इनका मन नही लगा और संसार से विरक्ति का भाव लेते हुए संयम पद पथ पर बढ़ते हुए इन्होंने 18 वर्ष की अल्पायु में श्री सिद्ध सागर जी से आजीवन ब्रहचर्य व्रत लिया। आगे चलकर जब उम्र 25 की हुई तो आजीवन जूते चप्पल का त्याग कर दिया। जब 32वर्ष की उम्र में जब आपने सम्मेदशिखर तीर्थ की वंदना की तो घी और तेल का आजीवन त्याग कर दिया। और शिखर जी की यात्रा के बाद 32 वर्ष की उम्र में ही एक समय भोजन का नियम ले लिया जीवन आपने एक समय ही भोजन किया।

सचमुच एक आत्मा जो पुण्यात्मा बन कर धर्मात्मा बन कर परमात्मा बनने की राह पर है उनका गुणानुवाद हम कर रहे है। इन्होंने सन् 1915 में उत्तर ग्राम में क्षुल्लक दीक्षा श्री देवेंद्र कीर्ति जी स्वामी से ग्रहण की। और आगे पायदान चलते हुए जब सन 1918में गिरनार यात्रा की तब 1008 श्री नेमिनाथ भगवान की 5 वी टोंक पर स्वयम ने ऐलक दीक्षा ली।

सन 1920 में आपने सर्वोत्कृष्ट पद मुनि दीक्षा यरनाल कर्नाटक में आपने मुनि दीक्षा ग्रहण की और इस मानव देह को धन्य किया। इसी के साथ इन्हे सन 1924 में आचार्य पद से सुशोभित किया गया।

उपाधियां
इन्हे अनेक उपाधियों से सुशोभित किया जिनका विवरण हम कर रहे है सन 1925 में श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक के बाद गुरुणा गुरु की उपाधि दी गई। यह उपाधि उन्हें इसलिए प्रदान की गई क्योंकि उन्होंने अपने दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी महराज को पुनः मुनि दीक्षा दी इसलिए भी गुरुणा गुरु कहा जाता है। जो अपने आप में एक इतिहास है। इसी के साथ
सन् 1937 में इनको चारित्र चक्रवर्ती पद से सुशोभित किया गया।
जिनवाणी संरक्षण
इनकी प्रेरणा से धवल, जय धवल टीका वाले षटखंडागम,महाबंध कषाय पाहुड ग्रन्थ त्रय को 50 मन तांबे पर 2664 पत्रों पर अंकित कराया यह ग्रंथ आज भी फलटण में सुशोभित विराजित है। जो जिनवाणी संरक्षण का अपने आप में एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
उपसर्ग
पूज्य आचार्य श्री के जीवन में अनेक उपसर्ग आए उनमें से कुछ उपसर्ग का विवरण हम आप तक साझा करने का प्रयास कर रहे हैं।
आपके जीवन मे सर्प के कोंगनोली गोकाक कौंनुर शेडवाल आदि 5 से अधिकअनेक उपसर्ग आए सिंह के गोकाक मुक्तागिर जंगल श्रवण बेलगोला यात्रा सोनागिर बावनगजा द्रोण गिरीसिद्ध क्षेत्रो 6 से अधिक उपसर्ग हुए। एवम अधिक मकोड़े के चींटी के मानव जन्य उपसर्ग हुए है। आपने नाम अनुरूप शांति के सागर बन कर उपसर्ग सहन किये।
आपने अपने साधु जीवन के 40 वर्षों में 9938 उपवास किए साथ ही 26 मुनि दीक्षा दी। जिनमे प्रथम मुनि श्री 108 वीरसागरजी महाराज रहे। इसके साथ ही 4आर्यिका दीक्षा दी जिनमे प्रथम आर्यिका 105 चन्द्रमती माताजी को प्रदान की 16 ऐलक दीक्षा प्रदान की प्रथम ऐलक 105 श्री पारीस सागर जी के रूप में प्रदान की इसके साथ ही इनके द्वारा 28 क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की जिसमे प्रथम क्षुल्लक 105 श्री
श्री नेमकीर्ति जी महराज को प्रदान की गई। एवम 14 क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की प्रथम क्षुल्लिका 105 श्री शांतिमति माताजी के रूप में दी। कुल 88 दीक्षाए आचार्य श्री के कर कमलों से हुई। इनके बड़े भाई ने भी इनसे मुनि दीक्षा लेकर मुनि श्री108 वर्द्धमान सागर जी महराज बने।
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त्याग पर नजर
पूज्य आचार्य श्री के त्याग और संयम पर नजर डालें तो इन्होंने 1105 दिन तक अनाज का त्याग विधर्मियो के मंदिर प्रवेश के विरोध में किया। 8 वर्षो तक श्रावको ने केवल दूध चावल पानी दिया एवम इसके अलावा 8 दिन तक आहार में पानी ही नही दिया। इनकी इतनी विशालता थी कि जब इन्होंने ललितपुर सन 1929 में वर्षा योग किया तो महा इन्होंने सभी प्रकार के रसों का आजीवन त्याग कर दिया। अगर पूज्य गुरुदेव के नियम सल्लेखना के ऊपर नजर डालें तो सर्वप्रथम 24
अक्टूम्बर 1951 में गजपंथा जी मे 12 वर्ष की नियम सल्लेखना ली। और 26 अगस्त 1955 को लिखित पत्र के माध्यम से पूज्य मुनि श्री 108 वीर सागर जी महाराज को आचार्य पद प्रदान किया। इसके साथ ही 36 दिन की सल्लेखना कर 18 सितंबर 1955 को इनकी उत्कृष्ट समाधि हुई।
वर्तमान में इनकी मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा में पंचम पट्टाधीश पद को वर्ष 1990 से वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्द्धमान सागर जी सुशोभित कर वर्ष 2021 का चातुर्मास कोथली में , श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में 24 वर्ष बाद आयोजित 1008 श्री महावीर स्वामी के महामस्तकाभिषेक के लिए श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में कराया। एवम 18 जुलाई 2022 को चातुर्मास कलश स्थापना ससंघ ने की।
अभी उदयपुर में मई माह में होने वाली पंच कल्याणक प्रतिष्ठा हेतु विहार चल रहा है।।
सभी आचार्यो को कोटिशः नमोस्तु
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य भक्त परिवार
अभिषेक जैन लुहाडिया
रामगंजमंडी
