*आपके आचरण एवं व्यवहार में जैनत्व झलकना चाहिए-विराट सागर महाराज……………*

धर्म

*आपके आचरण एवं व्यवहार में जैनत्व झलकना चाहिए-विराट सागर महाराज……………*

खुरई-
प्राचीन जैन मंदिर में आयोजित रविवारीय प्रवचन श्रृंखला को गति प्रदान करते हुए विराट सागर महाराज ने अपने “ओजस्वी वक्तव्य” में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जैनियों को अपने अंदर में झांकने की वर्तमान समय में बहुत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हम लोग तो जानवरों से भी ज्यादा बदतर बनते जा रहे हैं। बाहर से तो सफेद वस्त्र धारण कर लेते हैं परंतु अंदर ऐसा नहीं कर पाते। हम साधु होकर भी तुम्हारे कुल की मर्यादा को संभालने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं। नई पीढ़ी जब आपके आचरण को एवं व्यवहार को देखती है तो उसे धर्म से घृणा होने लगती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। आपके आचरण एवं व्यवहार में जैनत्व झलकना चाहिए।

मुनि श्री ने कहा कि पहले व्यक्ति की कथनी एवं करनी में लेश- मात्र भी अंतर नहीं होता था, परंतु वर्तमान समय में ऐसा नहीं देखने को मिलता। भले ही गुरु के सामने या मंदिर जी में जैन धर्म का पालन करें या ना करें, उनके बताए नियमों पर चले या न चले, परंतु जहां दुनिया की भीड़ होती है वहां उसको अपने व्यक्तित्व पर अपने आचरण पर जरूर ध्यान रखना चाहिए।रात्रि में भोजन का त्याग, देव दर्शन एवं छना-पानी जैनियों की पहचान हुआ करती थी, परंतु वर्तमान समय में हमारा आचरण, हमारा खान पियन, हमारा सब कुछ बिगड़ता जा रहा है। यह धारणा ठीक नहीं। मुनि श्री ने कहा कि अब तो ऐसा लगता है कि जैन धर्म इतिहास की वस्तु बनता जा रहा है। हम ना तो एक नेक इंसान ही बन पा रहे हैं और ना ही अपने अधिकार एवं कर्तव्य को समझ पा रहे हैं। हम सैकड़ों हजारों मूर्तियां तो विराजमान कर रहे हैं,परंतु काम इसके विपरीत करते हैं।जैन धर्म मूलतः सत्य एवं अहिंसा पर आधारित धर्म है। हम वास्तव में जैन धर्म का कितना परिपालन कर पा रहे हैं यह हमसे ज्यादा कोई नहीं जान सकता। जैन धर्म में परिग्रह को पाप की परिधि में रखा गया है। हमारे द्वारा किए गए जितने भी कार्य हैं, वह सभी स्वार्थ से परिपूर्ण दिखते हैं। हम कोई भी कार्य बिना स्वार्थ के नहीं करते, यह धारणा ठीक नहीं। हम चाहे समाज सेवा करें, चाहे राजनीति, चाहे धर्म या अन्य कोई परोपकार का कार्य सभी में हम अपना ही फायदा देखते हैं।वहां भी हम अर्थ को ही प्रधानता देते हैं, यह धारणा भी ठीक नहीं। अभी भी वक्त है, संभल जाओ, नहीं तो बहुत देर हो जाएगी!जैनियों को अपने जैन धर्म के बताए अनुसार ही अपना आचरण एवं व्यवहार करना चाहिए। अपने साधर्मी भाई ही नहीं वरन संपूर्ण राष्ट्र की रक्षा के लिए संकल्पित होना अनिवार्य है। भगवान महावीर के सिद्धांतों की वर्तमान समय में बहुत ही आवश्यकता है। प्राणी मात्र की रक्षा एवं दूसरों को जीवन दान देना ही सबसे बड़ा धर्म है। किसी की मजबूरी का फायदा कभी ना उठाएं।जितना बन सके निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा में तत्पर रहें, तभी हम अपने धर्म की रक्षा कर सकेंगे। —

 

 

तत्वार्थ सूत्र को कंठस्थ याद करने वालों का हुआ सम्मान.
-मुनि श्री विराट सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित तत्वार्थ सूत्र की कक्षा में सैकड़ों महिलाओं एवं युवाओं ने तत्वार्थ सूत्र को मौखिक रूप से रूपांतरित कर सबको आश्चर्यचकित कर दिया।इस प्रतियोगिता में सैकड़ों महिला-पुरुष, नव- युवकों ने भाग लिया। उसमें विजयी प्रतियोगियों का समाज के द्वारा सम्मानित किया गया। मुनि श्री ने इस अवसर पर कहा कि, एक समय ऐसा था जब तत्वार्थ सूत्र की वाचना करने पर ही इतना सम्मान मिलता था कि संपूर्ण नगर में तत्वार्थ सूत्र के वाचन करने वालों को घुमाया जाता था, उनका सम्मान होता था।परंतु वर्तमान परिवेश में हम देख रहे हैं कि तत्वार्थ सूत्र को कंठस्थ कर सैकड़ों व्यक्तियों के समक्ष सुनाना बहुत ही कठिन कार्य होता है।इसके लिए सभी साधुवाद के पात्र हैं। समस्त विजयी प्रतिभागियों ने मुनि श्री को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद लिया। प्रवचन सभा का संचालन रिंकू मुल्ला एवं अशोक शाकाहार ने किया। इस अवसर पर नगर एवं बाहर से आए सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित थे।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया                                                         रामगंजमडी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *