ज्ञान, तप और त्याग के युगपुरुष थे आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज, जिनकी साधना आज भी युगों को आलोकित कर रही है
मुनि दीक्षा महोत्सव पर विशेष भावांजलि — “जो है प्रकाश पुंज वीतराग ज्ञान में, इंसानियत जागी तुम्हारे संविधान में…”
आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के मुनि दीक्षा महोत्सव के पावन अवसर पर समूचा जैन समाज श्रद्धा, कृतज्ञता और भाव-विभोर स्मृतियों के साथ उन्हें नमन कर रहा है। ऐसे महामना संत, जिनके व्यक्तित्व का वर्णन शब्दों में संभव नहीं। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण तप, त्याग, संयम, करुणा और राष्ट्रचिंतन की अमिट गाथा है।
“जो है प्रकाश पुंज वीतराग ज्ञान में,
इंसानियत जागी तुम्हारे संविधान में।
अवतार महावीर के हो वर्तमान में…”
यह पंक्तियाँ आचार्य गुरुवर के विराट व्यक्तित्व को सहज ही अभिव्यक्त कर देती हैं।
10 जून 1946 को कर्नाटक के सदलगा ग्राम में जन्मे बालक विद्याधर ने कौन सोचा था कि एक दिन वही बालक आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज बनकर केवल अपने आत्मकल्याण का ही नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन का मार्गदर्शक बन जाएगा। उन्होंने पंचम काल में भी तप और संयम की ऐसी मिसाल स्थापित की, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बनी रहेगी।
आज गुरुदेव भले ही देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका तप, उनकी निष्पृहता, निर्मोहता, करुणा और वीतराग जीवन-दर्शन आज भी असंख्य साधकों के लिए प्रकाश स्तंभ है। उन्होंने स्वयं मोक्षमार्ग पर अग्रसर होकर अनगिनत आत्माओं को धर्म और आत्मकल्याण की दिशा प्रदान की।
समाज सेवा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अनुपम रहा। उनकी प्रेरणा से संचालित भाग्योदय पूर्णायु चिकित्सालय सेवा और करुणा का जीवंत प्रतीक है। वहीं प्रतिभास्थली जैसी अभिनव शिक्षा परियोजना ने हजारों बालिकाओं के जीवन में आत्मविश्वास और संस्कारों का प्रकाश फैलाया।
आचार्यश्री केवल आध्यात्मिक संत ही नहीं, बल्कि राष्ट्रचिंतक भी थे। वे सदैव कहते थे— “इंडिया नहीं, भारत बोलो।” उनका मानना था कि भारत नाम में हमारी संस्कृति, आत्मा और स्वाभिमान बसता है। वे मातृभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक थे और चाहते थे कि राष्ट्र की उन्नति अपनी भाषा और संस्कृति के सम्मान से ही संभव है।
राजनीति, कला, साहित्य, उद्योग और समाज—हर क्षेत्र के लोग उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए लालायित रहते थे। वे केवल जैन समाज के नहीं, बल्कि जन-जन के संत थे। प्रत्येक जीव के प्रति उनकी करुणा अद्भुत थी। जीवदया, गौसंरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के लिए उनका समर्पण दयोदय गौशाला जैसे सेवा प्रकल्पों में आज भी जीवंत दिखाई देता है।
उनकी साधना हिमालय से भी ऊँची और सागर से भी गहरी थी। उन्होंने अपने संयम और चरित्र से यह सिद्ध किया कि आत्मबल से संसार की हर ऊँचाई को प्राप्त किया जा सकता है। उनके जीवन से समाज ने महावीर की तपस्या को समझा, शास्त्रों की महिमा को जाना और चरित्र की वास्तविक शक्ति का अनुभव किया।
सचमुच, आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ज्ञान, तप, त्याग और संयम के ऐसे सूर्य थे, जिनकी तेजस्विता के आगे चंद्रमा और सूर्य का प्रकाश भी फीका प्रतीत होता है।
अंत में श्रद्धा के स्वर स्वतः फूट पड़ते हैं—
“कुंदकुंद से दिगंबर ज्ञान समंदर होय,
विद्यासागर वसुंधरा पर मेरे गुरुवर होय।”
— अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312

