भ्रष्ट व्यवस्था में स्वयं को ईमानदार रखना ही सबसे बड़ी विजय” — राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
मधुबन के गुणायतन में शंका समाधान कार्यक्रम के दौरान मुनिश्री ने कहा— अन्याय का समर्थन न करें, पर विवेकहीन टकराव से भी बचें; धैर्य, संतुलन और सिद्धांत ही जीवन की वास्तविक शक्ति हैं
मधुबन (गिरीडीह)
वर्तमान समय में जब समाज और व्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में भ्रष्टाचार तथा अनियमितताओं की चर्चा आम हो गई है, तब व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सिद्धांतों, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रखने की है। ऐसे समय में विवेक, धैर्य और व्यवहार-कुशलता ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं। यह प्रेरणादायी संदेश राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन, मधुबन में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम के दौरान दिया।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनिश्री के शंका समाधान कार्यक्रम से देश-विदेश के लाखों लोग प्रतिदिन जुड़ते हैं और जीवन, समाज, परिवार, नैतिकता, धर्म तथा अध्यात्म से जुड़े प्रश्नों के सहज, व्यावहारिक और तर्कसंगत उत्तर प्राप्त करते हैं। इसी क्रम में एक श्रद्धालु ने बढ़ते भ्रष्टाचार पर प्रश्न किया।
मुनि श्री ने उत्तर देते हुए कहा कि यदि हर बात का प्रतिवाद किया जाए तो व्यक्ति स्वयं भी व्यवस्था का शिकार बन सकता है, और यदि वह व्यवस्था के साथ बहने लगे तो भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। इसलिए न तो अन्याय का समर्थन करें और न ही परिस्थितियों का सही आकलन किए बिना संघर्ष का मार्ग अपनाएँ। व्यक्ति को ऐसा संतुलित मार्ग चुनना चाहिए, जिसमें वह स्वयं किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्य का सहभागी न बने।
उन्होंने कहा कि अपने आचरण को शुद्ध रखिए। यदि आप गलत कार्यों में सहभागी नहीं बनेंगे और संयम, शालीनता तथा ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य निभाएँगे, तो धीरे-धीरे लोग आपके चरित्र और कार्यशैली को पहचानने लगेंगे। समय के साथ परिस्थितियाँ भी आपके पक्ष में बनने लगती हैं।
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने आगे कहा कि आज का तंत्र कई स्थानों पर भ्रष्टाचार से प्रभावित दिखाई देता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति यह संकल्प लेकर चले कि “न स्वयं भ्रष्टाचार करूँगा और न किसी को करने दूँगा”, तो उसे अनेक चुनौतियों और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए परिस्थितियों की गंभीरता समझते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लेना आवश्यक है और अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में लगाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना निश्चित रूप से साहस का विषय है, लेकिन उससे पहले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका, सामर्थ्य और परिस्थितियों का भी सही मूल्यांकन करना चाहिए। यदि किसी स्थिति में व्यावहारिक समाधान की संभावना दिखाई न दे, तो अनावश्यक टकराव से बचते हुए अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना और स्वयं को भ्रष्टाचार से दूर रखना ही सबसे बड़ी जीत है। धर्म हमें संघर्ष के साथ-साथ विवेकपूर्ण आचरण की भी शिक्षा देता है।कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री संधान सागर महाराज ने किया।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

