*महान दूरदर्शी संत – आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज- मनोज कुमार जैन बांकलीवाल*
30 जून का दिन दिगम्बर जैन समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है। आज ही के दिन, 30 जून 1968 को अजमेर (राजस्थान) में मात्र 22 वर्ष की आयु में ब्रह्मचारी विद्याधर ने पूज्य आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। उस समय इतनी कम आयु में दिगम्बर निर्वस्त्र मुनि दीक्षा लेना अत्यंत विरल घटना थी। सामान्यतः जीवन की जिम्मेदारियाँ पूरी कर चुके वृद्धजन ही दीक्षा लेते थे, किन्तु आचार्यश्री ने यह धारणा बदल दी और यह सिद्ध किया कि त्याग, तप और संयम का मार्ग युवावस्था में भी अपनाया जा सकता है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी केवल एक महान तपस्वी नहीं थे, बल्कि वे युगदृष्टा, समाजद्रष्टा और राष्ट्रद्रष्टा संत थे। उन्होंने समाज की समस्याओं को केवल देखा नहीं, बल्कि उनके स्थायी और जीवंत समाधान भी प्रस्तुत किए।


गौसंरक्षण इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। जब वृद्ध और बीमार गायों को कसाइखानों में बेचे जाने की घटनाएँ बढ़ रही थीं, तब आचार्यश्री ने देशभर में गौशालाओं को खुलवाने प्रेरणा दी। उन्होंने सिखाया कि गाय केवल पशु नहीं, भारतीय संस्कृति और करुणा की प्रतीक है। आज अनेक गौशालाएँ उनकी प्रेरणा का प्रत्यक्ष परिणाम हैं।


नारी शिक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनका योगदान अद्वितीय है। उन्होंने समय की आवश्यकता को समझा कि आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कारों का समन्वय अनिवार्य है। इसी सोच से *प्रतिभास्थली* ज्ञानोदय विद्यालयों की स्थापना हुई, जहाँ अंग्रेज़ी, विज्ञान, कम्प्यूटर और आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, भारतीय संस्कृति, योग, गृहविज्ञान और खेलों का समन्वित शिक्षण दिया जाता है।

उन्होंने सैकड़ों ब्रह्मचारिणी बहनों को प्रशिक्षित कर इन संस्थानों की जिम्मेदारी सौंपी, ताकि आने वाली पीढ़ियों में भारतीय संस्कृति, चरित्र और नैतिक मूल्यों का संवर्धन हो। अनेक बार जब युवतियाँ दीक्षा लेने का आग्रह करती थीं, तब वे उन्हें समझाते थे कि वर्तमान समय में समाज को संस्कारित बेटियाँ तैयार करने वाली शिक्षिकाओं की अधिक आवश्यकता है। यह विचार वास्तव में महिला सशक्तिकरण का एक अनूठा भारतीय मॉडल है।
स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी उनकी दूरदृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने दयोदय बहु-विशेषता अस्पताल जैसे सेवा प्रकल्पों की प्रेरणा दी, जहाँ सेवा, संवेदना और चिकित्सा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उनका मानना था कि जैन समाज केवल मंदिर निर्माण तक सीमित न रहे, बल्कि अस्पताल, शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में भी अग्रणी भूमिका निभाए।
इसी प्रकार भारतीय चिकित्सा पद्धति के पुनर्जागरण के लिए उन्होंने *पूर्णायु आयुर्वेद संस्थान* जैसे अनुसंधान एवं चिकित्सालयों की प्रेरणा दी। उनका विश्वास था कि आयुर्वेद केवल वैकल्पिक चिकित्सा नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य वैज्ञानिक धरोहर है। आज वहाँ कैंसर, हृदय, यकृत, वृक्क तथा अनेक जटिल रोगों का विशेषज्ञ आयुर्वेदिक उपचार एवं शोध कार्य हो रहा है।
*हथकरघा और स्वरोज़गार* के क्षेत्र में उनका चिंतन भी अत्यंत प्रेरणादायी था। जेल प्रवास के दौरान उन्होंने बंदियों और उनके परिवारों की आर्थिक पीड़ा को निकट से देखा। उन्होंने प्रवचनों द्वारा हजारों बंदियों के जीवन में नैतिक परिवर्तन लाया, अनेक लोगों को शाकाहार अपनाने की प्रेरणा दी और उनके पुनर्वास के लिए हथकरघा उद्योग प्रारम्भ करवाए। जो प्रयास सुधार अभियान के रूप में शुरू हुआ, वह आगे चलकर हजारों परिवारों के लिए सम्मानजनक रोजगार का माध्यम बन गया। भारतीय हस्तकरघा के पुनर्जीवन में भी उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।
आचार्यश्री का जीवन हमें बताता है कि संत केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, गौसंरक्षण, महिला सशक्तिकरण, आयुर्वेद, रोजगार, साहित्य, पर्यावरण और संस्कार—हर क्षेत्र में ऐसी सोच दी जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनी रहेगी।
आज उनकी मुनि दीक्षा जयंती पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा प्रारम्भ किए गए सेवा, शिक्षा और संस्कार के प्रकल्पों को आगे बढ़ाएँ। मंदिरों के साथ विद्यालय, गौशालाएँ, चिकित्सालय, आयुर्वेद केन्द्र, हथकरघा प्रशिक्षण केन्द्र और संस्कार केन्द्र स्थापित करना ही उनके स्वप्नों का भारत बनाने की दिशा में हमारा वास्तविक योगदान होगा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज वास्तव में केवल एक संत नहीं, बल्कि भारत के महान दूरदर्शी ऋषि थे, जिनकी दृष्टि आने वाली कई पीढ़ियों तक समाज का मार्गदर्शन करती रहेगी।
— मनोज कुमार जैन ‘बांकलीवाल’
आगरा
