आचार्यश्री १०८ विनिश्चय सागरजी महाराज : त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक* मम गुरु विनिश्चयसागर अवतरण दिवस पर विशेष

धर्म

आचार्यश्री १०८ विनिश्चय सागरजी महाराज : त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक*
मम गुरु विनिश्चयसागर अवतरण दिवस पर विशेष

मुरैना (मनोज जैन नायक)

संत सान्निध्य, संत समागम, संत वाणी का श्रवण विरले ही व्यक्तियों को मिलता है । यू तो संसार में हजारों हजारों की संख्या में संत देखे जा सकते हैं लेकिन संत समाज में भी दिगम्बर जैन संतों की क्रियाएं, चर्या, तपस्या, त्याग, संयम। साधना देखते ही बनती है । मम गुरु बाक्केशरी आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज : ज्ञान, तप और वैराग्य की साकार प्रतिमूर्ति हैं। पूज्य गुरुदेव के चेहरे का तेज, वात्सल्य, मुख के उच्चारित मंगल वाणी सभी भक्तों का मन मोह लेती है।

भारतीय संत परम्परा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक साधना से समाज को नई दिशा प्रदान की। उन्हीं महान विभूतियों में गणाचार्यश्री विराग सागरजी महाराज के परम प्रभावक एवं अज्ञानुवृति शिष्य आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका संपूर्ण जीवन आत्मकल्याण, धर्मप्रभावना, ज्ञानार्जन और जनजागरण के लिए समर्पित रहा है।


आचार्यश्री विनिश्चय सागर का पूर्वाश्रम नाम अरुण कुमार जैन था। आपका जन्म 26 जून 1973 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया ग्राम में एक धार्मिक एवं संस्कारवान दिगम्बर जैन परिवार में हुआ। आपकी माताजी का नाम श्रीमती कुसुमदेवी जैन तथा पिताजी का नाम श्री रमेशचंद्र जैन है। बाल्यकाल से ही आपके भीतर धर्म, अध्ययन और वैराग्य के संस्कार विद्यमान थे। आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर होने का निश्चय किया।

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धर्म के प्रति गहन अनुराग और आत्मकल्याण की तीव्र भावना ने आपको सांसारिक जीवन से विरक्त कर दिया। 29 जनवरी 1995 को अल्प आयु में ही आपने गृह त्याग कर संयम पथिक बनने की ओर कदम बढ़ाया । 26 फरवरी 1995 को अतिशय क्षेत्र आहारजी में आपने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर आध्यात्मिक साधना का शुभारम्भ करते हुए संयम पथ पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया । इसके पश्चात 23 फरवरी 1996 को देवेंद्र नगर में ऐलक दीक्षा प्राप्त कर संयम मार्ग को और दृढ़ता से अपनाया।
आत्मोन्नति की इस साधना यात्रा का अगला महत्वपूर्ण चरण 14 दिसंबर 1998 को आया, जब मध्यप्रदेश के बरासो क्षेत्र में आपने पूज्य गुरुदेव विरागसागरजी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। आपने पूज्य गुरुदेव के पावन सान्निध्य में आपने कठोर तप, गहन अध्ययन और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से अपने व्यक्तित्व को निखारा।

 

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आपकी असाधारण साधना, अनुशासन, विद्वत्ता और संघ संचालन की क्षमता को देखते हुए वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के कुण्थलगिरि में आपको जैन परम्परा के सर्वोच्च पदों में से एक आचार्य पद से विभूषित घोषित किया गया एवं अतिशय क्षेत्र करगुवांजी झांसी में गुरुदेव विरागसागरजी द्वारा 24 मई 2017 को आचार्य पद के संस्कार किए गए । वर्तमान में आपका नाम दिगम्बर संतों की श्रृंखला में सम्पूर्ण जैन समाज में श्रद्धा और प्रेरणा का केन्द्र है।
आचार्य श्री केवल तपस्वी संत ही नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट विद्वान और गंभीर चिंतक भी हैं। आपने जैन आगम एवं दार्शनिक ग्रंथों का व्यापक अध्ययन किया है। श्रावकाचार, द्रव्यसंग्रह, कातन्त्र-रूपमाला, मोक्षशास्त्र, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, इष्टोपदेश, समयसार, परीक्षामुख, न्यायदीपिका, मूलाचार, गोम्मटसार जीवकाण्ड, सर्वार्थसिद्धि, धवला आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का आपने गहन अध्ययन एवं मनन किया है।
आपकी विशेष रुचि अध्ययन, चिंतन, मनन, आत्मविश्लेषण और प्रभावशाली प्रवचनों के माध्यम से धर्मप्रचार में रही है। आपके प्रवचन सरल, तर्कसंगत और जीवनोपयोगी होते हैं, जो श्रोताओं के हृदय को स्पर्श कर आत्मजागरण का संदेश देते हैं।
आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज का जीवन त्याग, संयम, करुणा और आत्मानुशासन का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपने उपदेशों के माध्यम से असंख्य लोगों को नैतिक जीवन, अहिंसा, सदाचार और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि सच्चा सुख बाह्य भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति में निहित है।
पूज्य मम गुरुदेव वाक्केशरी आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज के अवतरण दिवस पर पूज्यश्री के चरणों में कोटि कोटि नमन ।
*लेखक – मनोज जैन नायक, मुरैना*

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