मोरपंख के प्रयोग में किसी प्रकार की हिंसा नहीं, तथ्यहीन आरोप लगाने वाले स्पष्टीकरण दें” — मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

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“मोरपंख के प्रयोग में किसी प्रकार की हिंसा नहीं, तथ्यहीन आरोप लगाने वाले स्पष्टीकरण दें” — मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

गिरीडीह।

सोशल मीडिया पर मोरपंख को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों और आरोपों का खंडन करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि जैन मुनियों की पिच्छी में प्रयुक्त होने वाला मोरपंख किसी भी प्रकार की हिंसा का परिणाम नहीं है, मोरों की हत्या कर पंख प्राप्त किए जाने संबंधी बातें पूरी तरह निराधार, तथ्यहीन तथा समाज में भ्रम फैलाने वाली हैं उपरोक्त जानकारी देते हुये “गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री सांयकालीन शंका समाधान में एक श्रावक द्वारा उठाये गये प्रश्न का उत्तर दे रहे थे मुनि श्री ने कहा कि भारत में मोर को राष्ट्रीयपक्षी का दर्जा प्राप्त है और उसके संरक्षण के प्रति सरकार को सजग रहना चाहिये यदि कहीं अवैध शिकार हो रहा है तो उसे रोकना सरकार की सबसे पहले जिम्मेदारी है, किंतु यह कहना कि केवल मोरपंख प्राप्त करने के लिए लाखों मोरों की हत्या की जाती है,यह वास्तविकता से परे है? जैन मुनियों की पिच्छी में प्रयुक्त होने वाले मोरपंख मोर द्वारा प्राकृतिक रूप से त्यागे गए पंख होते हैं। जिस प्रकार मनुष्य अपने बढ़े हुए बाल कटवाता है, उसी प्रकार मोर भी समय आने पर अपनी चोंच से पुराने पंख स्वयं अलग कर देता है।

 

 

यही पंख विभिन्न माध्यमों से संग्रहित होकर समाज तक पहुँचते हैं और पिच्छी निर्माण में उपयोग किए जाते हैं।मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि किसी मृत अथवा मारे गए मोर से प्राप्त पंख पिच्छी के लिए उपयोगी नहीं होते, क्योंकि वे टूट-फूट जाते हैं और उनकी प्राकृतिक संरचना नष्ट हो जाती है। इसके विपरीत स्वाभाविक रूप से झड़े हुए पंखों में विशिष्ट नोक सुरक्षित रहती है, जिससे उनकी पहचान की जा सकती है।

उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ लोगों द्वारा 15 लाख मोरों की हत्या जैसे दावे किए जा रहे हैं, जबकि इसके समर्थन में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।यदि वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में मोरों का शिकार हुआ होता तो यह राष्ट्रीय स्तर का गंभीर विषय बन जाता। बिना तथ्यों के दिए गए ऐसे बयान समाज में भ्रम और अनावश्यक विवाद उत्पन्न करते हैं।मुनि श्री ने कहा कि पूरे देश में जैन मुनियों की संख्या सीमित है और पिच्छियों कीआवश्यकता भी अत्यंत कम होती है। ऐसे में लाखों मोरों की हत्या का आरोप तर्क और गणना दोनों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

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उन्होंने बताया कि मोरपंख अत्यंत हल्का, कोमल और जीव-दया के अनुकूल होता है। दिगंबर जैन मुनि इसका उपयोग जीवों को सावधानीपूर्वक हटाने अथवा भूमि को साफ करने के लिए करते हैं, ताकि सूक्ष्म जीवों की भी हिंसा न हो। इस दृष्टि से पिच्छी अहिंसा का प्रतीक और दिगंबर मुनि की पहचान है।

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मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि जैन धर्म की संपूर्ण साधना अहिंसा पर आधारित है। यदि मोरपंख हिंसा से प्राप्त होता, तो जैन मुनि उसका प्रयोग तो दूर, उसका स्पर्श करना भी स्वीकार नहीं करते। इसलिए बिना प्रमाण के लगाए गए ऐसे आरोप जैन संस्कृति, परंपरा और अहिंसा की साधना पर प्रश्नचिह्न लगाने के समान हैं।

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उन्होंने समाज से अपील की कि किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया देने से पहले तथ्यों की जांच अवश्य करें तथा भ्रम फैलाने वाली बातों से बचें। साथ ही जैन समाज को भी ऐसे विषयों पर शांतिपूर्वक, संयमित एवं तथ्यात्मक ढंग से अपना पक्ष रखने की आवश्यकता है।

 गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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