दूसरों के अधिकार पर बुरी नजर रखने वाले मिलती है: पराजय सुधासागर महाराज

धर्म

दूसरों के अधिकार पर बुरी नजर रखने वाले को मिलती है: पराजय सुधासागर महाराज 

 गुना

श्री ऋषभायतन नसिया जी में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, जगत पूज्यनिर्यापक श्रमण मुनिपुगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने जीवन, धर्म और संस्कारों पर आधारित गहन प्रवचन देते हुए कहा कि पिता, गुरु और भगवान से प्राप्त वसीयत को मनुष्य को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानकर स्वीकार करना चाहिए। लेकिन भाई या बहन को मिली वसीयत पर यदि कोई व्यक्ति अपनी बुरी नियत रखता है तो उसका पतन और दुर्गति निश्चित है।

 

 

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उन्होंने कहा कि संसार में अधिकांश विवाद अधिकार और संपत्ति की गलत भावना के कारण उत्पन्न होते हैं, जबकि धर्म हमें त्याग, संतोष और मर्यादा का मार्ग सिखाता है। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में धर्म, संस्कार और योग्यता को सर्वोच्च स्थान दें, क्योंकि यही वास्तविक संपत्ति है जो मनुष्य को सम्मान और आत्मिक उन्नति प्रदान करती है।महाराज श्री ने कहा- योग्यता बची रही तो सब कुछ बचा रहेगा, समाप्त हुई तो जीवन भी बिखर जाएगाAdvertisement for Sudha Amrit mustard oil showing metal tin and assorted bottles (5 L, 2 L, 1 L, 500 ml, 200 ml) with 100% pure claim and contact number 9602091568.Smiling man with folded arms in a plaid shirt on the left; sunrise over mountains and a Hindi motivational quote on the right: 'जिनने धैर्य सीख लिया, उसने जीत का रास्ता पा लिया.'

 

 

 

 

भरत-बाहुबली का उदाहरण देकर समझाया लालच करने का परिणाम

 

 

मुनिश्री ने भगवान आदिनाथ के पुत्र चक्रवर्ती भरत और बाहुबली के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान आदिनाथ ने अपने सभी पुत्रों को उनकी योग्यता के अनुसार वसीयत और अधिकार प्रदान किए थे। 98 भाइयों ने अपनी वसीयत भरत को सौंप दी, लेकिन बाहुबली ने अपने हिस्से की रक्षा को अपना कर्तव्य समझा। भरत छह खंडों के अधिपति होने के बावजूद अपने छोटे भाई के राज्य पर भी अधिकार चाहते थे। इसी कारण दोनों भाइयों के बीच युद्ध हुआ और अंततः भरत कोपराजय का सामना करना पड़ा। 

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मुनिश्री ने कहा कि यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि दूसरों के अधिकार पर बुरी नजर रखने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे अपमान और पराजय का सामना करना पड़ता है।

 

 

मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी योग्यता है

धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी योग्यता होती है। व्यक्ति मंदिर जाए या न जाए, दान दे या न दे, लेकिन उसे धर्म पालन, दान और सेवा की योग्यता कभी समाप्त नहीं होने देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुल, समाज, राष्ट्र और धर्म की गरिमा बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। एक बार धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं हटना चाहिए, चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को जीवन में कम से कम एक बार सिद्ध क्षेत्र सम्मेद शिखरजी की यात्रा करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि धर्म का मार्ग ही आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग है। उनके प्रेरक प्रवचनों से धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और पूरे परिसर में भक्ति एवं आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहा।

       संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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