“कर्म करने से पहले परिणाम का विचार और कर्म करने के बाद आत्मसमीक्षा का अभ्यास—यही श्रेष्ठ जीवन की कुंजी है” -मुनि श्री प्रमाण सागर
गिरीडीह मधुवन
राष्ट्रीय संत मुनि श्री 108प्रमाण सागर महाराज ने कहा “मनुष्य” प्रायः कर्म करते समय उसके परिणामों पर विचार नहीं करता, किंतु जब उन कर्मों का फल सामने आता है, तब वह चिंतित होकर पूछता है—”मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” का जबाब देते हुये मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि अज्ञानी व्यक्ति पाप करते समय नहीं सोचता,पर जब उसका परिणाम सामने आता है, तब पछताता है औरअपने भाग्य अथवा ईश्वर को दोष देता है,
मुनि श्री ने कहा कि यदि व्यक्ति प्रत्येक कर्म करने से पहले उसके संभावित परिणामों पर विचार कर ले, तो वह अनेक भूलों और दुःखों से बच सकता है। इसलिए जीवन में *आत्मसमीक्षा* का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है।समय-समय पर अपने कार्यों, विचारों और व्यवहार का निरीक्षण करना चाहिए कि क्या उचित है?और क्याअनुचित? क्या करना चाहिए?और क्या नहीं करना चाहिये?

मुनि श्री ने कहा कि जीवन में प्राप्त होने वाला सुख हमारे शुभ कर्मों का प्रतिफल है,जबकि दुःख और कठिनाइयाँ अशुभ कर्मों के परिणाम हो सकते हैं। इस सत्य को स्वीकार कर लेने से व्यक्ति परिस्थितियों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करता है। वह न तो सुख में अहंकार करता है और न दुःख में निराश होता है। मुनि श्री ने कहा कि जब मन में यह दृढ़ विश्वास स्थापित हो जाता है कि प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है, तब व्यक्ति अपने आचरण के प्रति अधिक सावधान और जागरूक हो जाता है।

यही जागरूकता उसे पाप और अनुचित कार्यों से बचाती है तथा सदाचार, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग की ओर अग्रसर करती है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावानी ने बताया गुणायतन परिसर में प्रतिदिन प्रातः 7:15 पर भगवान का अभिषेक एवं मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के मुखारविंद से शांति धारा संपन्न हो रही है एवं संध्याकाल 6:20 पर शंकासमाधान कार्यक्रम लाइव टेलीकास्ट होता है जिसे भारत ही नहीं अपितु विदेश में भी यह कार्यक्रम देखा जाता है
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

