आत्मबोध, रत्नत्रय और चैतन्य स्वरूप की पहचान ही जीवन की सबसे बड़ी कला – आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज*

धर्म

*आत्मबोध, रत्नत्रय और चैतन्य स्वरूप की पहचान ही जीवन की सबसे बड़ी कला – आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज*

 

पावागढ़ (गुजरात), 5 जून 2026।

सिद्धक्षेत्र पावागढ़ की पावन वंदनीय भूमि पर आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य प्राकृताचार्य 108 आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज ने आत्मकल्याण, चैतन्य स्वरूप की पहचान तथा रत्नत्रय की महत्ता पर अत्यंत प्रेरक एवं ज्ञानवर्धक प्रवचन प्रदान किया। प्रवचन के प्रारंभ में भगवान ऋषभदेव, भगवान पार्श्वनाथ, भगवान महावीर तथा आचार्य परंपरा के जयघोषों से वातावरण भक्तिमय हो उठा।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि संसार में अनेक प्रकार की कलाएं हैं, किंतु सबसे बड़ी कला अपनी आत्मा का उद्धार करना है। जीविका कमाना, परिवार चलाना या विभिन्न प्रकार की सांसारिक उपलब्धियां प्राप्त करना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ना उससे कहीं अधिक दुर्लभ और महान उपलब्धि है।उन्होंने एक श्लोक का उल्लेख करते हुए बताया कि आत्मा शरीर के समान विस्तार वाली है, किंतु शरीर से सर्वथा भिन्न है। आत्मा चेतन है जबकि शरीर जड़ है। जो व्यक्ति देह और आत्मा के भेद को समझ लेता है, वही सम्यग्दर्शन की प्राप्ति करता है। देह और जीव को एक मानना अज्ञान का लक्षण है।

 

 

आचार्य श्री ने आत्मा को “निरंजन” बताते हुए कहा कि कर्मरूपी कलंक से रहित शुद्ध आत्मस्वरूप ही वास्तविक स्वरूप है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय आदि कर्मों से मुक्त होकर आत्मा अपनी पूर्ण निर्मलता को प्राप्त करती है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को निरंतर “मैं शुद्ध चैतन्य आत्मा हूं” ऐसी भावना करने की प्रेरणा दी।Advertisement for Sudha Amrut mustard oil showing yellow background, mustard seeds, oil bottles and price/pack sizes; highlights 100% mustard oil and FSSAI mark.

 

 

प्रवचन में उन्होंने सकारात्मक चिंतन की शक्ति पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि मन कल्पवृक्ष के समान है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका जीवन बनता जाता है। यदि व्यक्ति सकारात्मक भावनाओं के साथ धर्म, समाज और आत्मकल्याण के कार्यों में जुटता है तो उसे उसी प्रकार के सहयोगी, साधन और अवसर प्राप्त होते जाते हैं। वहीं नकारात्मक सोच व्यक्ति की प्रगति में बाधक बनती है।

 

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आचार्य श्री ने कहा कि जिनधर्म की सेवा और रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील बुद्धि ही वास्तव में प्रशंसनीय है। ऐसी बुद्धि का कोई मूल्य नहीं जो व्यक्ति को पापकर्मों और गलत मार्गों की ओर ले जाए। उन्होंने सभी को जिनवाणी, देव, शास्त्र और गुरु के सान्निध्य में रहकर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होने का संदेश दिया।

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ज्ञान की उत्पत्ति के विषय में उन्होंने कहा कि वास्तविक ज्ञान बाहर से नहीं आता, बल्कि आत्मा के भीतर से प्रकट होता है। शास्त्र, गुरु और धर्म केवल निमित्त बनते हैं। जैसे कुएं से पानी निकालने पर भीतर से निरंतर जल आता रहता है, वैसे ही आत्मा के भीतर ज्ञान का अनंत स्रोत विद्यमान है।

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आचार्य श्री ने पावागढ़ सिद्धक्षेत्र की महिमा का वर्णन करते हुए बताया कि यह मोक्षभूमि अनादिकाल से साधना और आत्मकल्याण का केंद्र रही है। उन्होंने श्रद्धालुओं से पावागढ़ पर्वत स्थित प्राचीन जिनालयों की वंदना करने तथा धर्मप्रभावना में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।

 

 

प्रवचन के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भगवान महावीर स्वामी से संबंधित प्राचीन स्थलों के संरक्षण एवं उनके ऐतिहासिक नामों को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि भारत की श्रमण, जैन और वैदिक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समाज और शासन दोनों को सतत प्रयासरत रहना चाहिए।

 

 

अंत में आचार्य श्री ने सभी श्रद्धालुओं के लिए मंगलकामना करते हुए कहा कि जीवन में बैर, विरोध, व्यसन और आक्रोश के स्थान पर शांति, आनंद, संयम और आत्मानुभूति का विकास हो तथा सभी जीव तीर्थंकरों द्वारा प्रदर्शित मोक्षमार्ग परचलकर अपने जीवन को सफल बनाएं।

    संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

 

 

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