*”संस्कारों की प्रथम पाठशाला माँ,णमोकार महामंत्र आत्मिक उत्कर्ष का आधार” :- मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज*
(गिरीडीह)
मधुवन गुणायतन के प्रांगण में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम के अंतर्गत धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि यदि माँ संस्कारी, सदाचारी और आदर्श जीवन जीने वाली होगी,तो उसके आचरण का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बच्चों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि माँ संस्कारों की प्रथम पाठशाला और प्रथम शिक्षिका होती है। माँ के संस्कारों से परिवार में प्रेम, अनुशासन, विनम्रता और नैतिकता के पुष्प खिलते हैं।
मुनि श्री ने कहा कि विद्यालय भी संस्कार निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र है। विद्यालय में तभी श्रेष्ठ संस्कारों का वातावरण निर्मित होगा, जब शिक्षक स्वयं संस्कारी, चरित्रवान और आदर्श व्यक्तित्व वाले हों। बच्चे केवल पुस्तकों से ही नहीं, बल्कि अपने माता-पिता और शिक्षकों के आचरण से भी सीखते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने घरों को संस्कारों का मंदिर तथा विद्यालयों को संस्कारों का केंद्र बनाएँ। यह तभी संभव है जब परिवार के सभी सदस्य, विशेषकर माताएँ, तथा शिक्षक अपने जीवन में सद्गुणों को धारण करें।
घर और विद्यालय दोनों स्थानों पर संस्कारों का वातावरण होने पर ही आदर्श नागरिकों का निर्माण होगा और राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बनेगा। गुणायतन मध्य भारत के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्या वाणी ने बताया धर्मसभा में मुनि श्री ने”णमोकार महामंत्र” को आत्मिक उत्कर्ष का आधार बताते हुए कहा कि मंत्रों की आराधना हमारी संस्कृति की प्राचीन परंपरा रही है। जैन धर्म में णमोकार महामंत्र को अनादि-सिद्ध मंत्र माना गया है और संसार के सभी मंत्रों में इसका स्थान विशिष्ट एवं सर्वोपरि है।मुनि श्री ने इसकी चार प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पहली विशेषता यह है कि अन्य मंत्रों में किसी न किसी देवता अथवा बीजाक्षर का समावेश होता है, जबकि णमोकार महामंत्र में न कोई देवता है और न ही कोई बीजाक्षर। इसमें केवल पंच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। पाँच पदों और पैंतीस अक्षरों से युक्त यह मंत्र आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

दूसरी विशेषता यह है कि इस मंत्र की कोई आनुपूर्वी नहीं है। इसका प्रत्येक पद स्वयं में पूर्ण मंत्र है। “णमो अरिहंताणं”, “णमो सिद्धाणं”, “णमो आयरियाणं”, “णमो उवज्झायाणं” तथा “णमो लोए सव्वसाहूणं” सभी पद स्वतंत्र रूप से मंत्र स्वरूप हैं। इतना ही नहीं, पंच परमेष्ठियों के नामों के प्रथम अक्षर भी मंत्र रूप माने गए हैं। संसार के अन्य मंत्रों में ऐसी विशेषता अत्यंत दुर्लभ है।

तीसरी विशेषता यह है कि णमोकार महामंत्र अनादि-सिद्ध है। अन्य मंत्रों को विशेष साधना द्वारा सिद्ध करना पड़ता है, जबकि यह मंत्र स्वयं सिद्ध है। इसकी श्रद्धापूर्वक आराधना और जप मात्र से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

चौथी विशेषता यह है कि यह मंत्र केवल शांतिक एवं पौष्टिक कार्यों का ही साधक है। मारण,मोहन, उच्चाटन अथवा किसी प्रकार के अशुभ कार्यों के लिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। यह मंत्र आत्मा को शुद्धता, शांति और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।

मंत्र साधना के विषय में मुनि श्री ने कहा कि साधक को शुद्ध आचरण वाला, विनयी, सम्यग्दृष्टि, श्रद्धालु तथा मंत्र के सार्थक अर्थ का ज्ञाता होना चाहिए। यदि ब्रह्मचर्य पूर्वक इस मंत्र की आराधना की जाए तो उसका प्रभाव और भी श्रेष्ठ होता है।
अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
