गुरु तो गंगा के पावन जल के समान होते हैं आर्जव सागर महाराज

धर्म

गुरु तो गंगा के पावन जल के समान होते हैं आर्जव सागर महाराज
अशोकनगर
सुभाषगंज में आचार्य श्री 108 आर्जव सागर महाराज ने चिंता के विषय पर प्रकाश डाला और चिंता को चिता के समान बताते हुए चिंता शरीर को जला देती है आचार्य श्री ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया और कहा कि सभी को व्यर्थ की चिंताओं बचना चाहिए।

 

 

वर्तमान के सत्य को बताते हुए कहा कि आज व्यक्ति धन की सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित रहता है। अतीत के समय पर बोलते हुए महाराज जी ने चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के विषय में कहा कि समय ऐसा भी था जब घरों में ताले नहीं लगा करते थे, उन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य गुरु चाणक्य के बारे मे बताया की अपना काम करते समय सरकारी तेल से जलनें वाले दीप का प्रयोग तक नहीं करते थे।ये थी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था


उन्होंने कहा कि गुरु तो गंगा के समान है मानो तो गंगा मां है ना मानो तो बहता पानी वे हमेशा आप के जीवन की उत्थान की ही तो कामना करते हैं उन्हें आप से कुछ भी नहीं चाहिए वस वे तो इतना चाहते हैं कि आपको मानव जीवन मिला है इससे एक कदम तो आप आगे बढ़ सकें जिसके पास जितनी परिग्रह होगा उसका संसार उतना ही दीर्घ मानकर चलना और वह
संसार में उतने ही परेशान होते हैं उनकी शान्ति भंग हो जाती है धन‌ की चिंता में व्यक्ति अपनी जिंदगी की सुख सुविधा ही भूल जाते हैं धन की चाह में जीवन विगड रहा है धन की प्राप्ति भी धर्म से होगी धर्म से पुण्य की प्राप्ति होगी पुण्य के योग से धन दौलत अपने आप आतीं चलीं जाती है।
*संसार से वचने के लिए राग द्वेष छोड़ना पड़ेगा*
उन्होंने कहा कि अनाधिकाल से ये संसार का संवंध चल रहा है इससे वचने के लिए राग द्वेष छोड़ना पड़ेगा इसलिए हमारे साधु पर पदार्थ को छोड़ सब कुछ सहते हुए इसको उतना ही देते हैं जितना आवश्यक है हम उतना ही देते हैं जितनी आवश्यकता है फिर देखें आप भी आगे बढ़ना प्रारंभ हो जाएगा।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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