“जीवन को श्रेष्ठ बनाना है तो भावनाओं को श्रेष्ठ बनाइए” — मुनि श्री प्रमाण सागर
गिरीडीह (मधुवन)
-“मनुष्य जैसा भीतर से सोचता और महसूस करता है,वैसा ही उसका व्यक्तित्व बन जाता है” उक्त उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने सायंकालीन शंका समाधान कार्यक्रम में व्यक्त किए।उन्होंने कहा कि यदि हमारी भावनाएँ पवित्र, सकारात्मक और मंगलमय होंगी तो हमारी सोच भी सकारात्मक होगी। सोच अच्छी होगी तो वचन मधुर होंगे, वचन मधुर होंगे तो व्यवहार उत्तम होगा और व्यवहार उत्तम होगा तो जीवन स्वतः सुंदर, शांत एवं सफल बन जाएगा। इसलिए जीवन-परिवर्तन की शुरुआत स्वयं की भावनाओं को श्रेष्ठ बनाने से करनी चाहिए।
मुनिश्री ने भावनाओं की शुद्धि का सरल एवं प्रभावी उपाय बताते हुए कहा कि नियमित भावनायोग करने से मन की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ कम होती हैं तथा करुणा, मैत्री, क्षमा, कृतज्ञता और आत्मचिंतन जैसे श्रेष्ठ भावों का विकास होता है। जो व्यक्ति नियमित भावनायोग करता है, उसकी भावनाएँ निर्मल होती हैं, विचार सकारात्मक बनते हैं और जीवन में संतुलन तथा शांति का अनुभव बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि वास्तव में भावनायोग अंतर्मन की भाव-शुद्धि का एक सशक्त साधन है। जिसकी भावनाएँ शुद्ध हो जाती हैं, उसका जीवन भी शुद्ध, सार्थक और प्रेरणादायक बन जाता है। भावना से सोच, सोच से वचन, वचन से व्यवहार और व्यवहार से जीवन का निर्माण होता है। इसलिए यदि जीवन को श्रेष्ठ बनाना है तो भावनाओं को श्रेष्ठ बनाना आवश्यक है।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में मुनिश्री ने कहा कि भगवान न तो किसी को कुछ देते हैं और न किसी से कुछ लेते हैं, फिर भी उनकी भक्ति मनुष्य के जीवन में गहरा परिवर्तन लाती है। भगवान की भक्ति का उद्देश्य सांसारिक लाभ प्राप्त करना नहीं, बल्कि भावनाओं की शुद्धि, मन की निर्मलता और कर्मों की निर्जरा करना है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई विशाल वृक्ष अपने पास आने वाले को बिना कुछ कहे छाया प्रदान करता है, उसी प्रकार भगवान की शरण में जाने से मन को शांति, स्थिरता और आत्मिक बल प्राप्त होता है। जब मनुष्य श्रद्धा और समर्पण के साथ भगवान का स्मरण करता है तो उसकी भाव-दशा बदलती है। भावों के परिवर्तन से उसके विचार, व्यवहार और जीवन-दृष्टि में भी परिवर्तन आता है। जैन दर्शन इसे कर्मों की निर्जरा का कारण मानता है।
मुनिश्री ने कहा कि भक्ति के माध्यम से मन में अहोभाव, विनम्रता, कृतज्ञता और वैराग्य का विकास होता है, जिससे आत्मा पर पड़े कर्मों का प्रभाव क्षीण होने लगता है। जो साधक गहन ध्यान में स्थित होकर आत्मस्वरूप में रमण कर सकता है, उसे भक्ति की आवश्यकता नहीं रहती; किंतु जो अभी संसार के आकर्षणों में उलझा हुआ है, उसके लिए भक्ति ही श्रेष्ठ साधन है। भक्ति में ही विरक्ति का बीज छिपा होता है। भक्ति करते-करते मन संसार से हटकर आत्मा की ओर मुड़ने लगता है।मूर्ति-पूजा के संदर्भ में मुनिश्री ने कहा कि मूर्ति पत्थर की हो सकती है, किंतु श्रद्धालु के लिए वह केवल पत्थर नहीं रहती, बल्कि अपने आराध्य देव का प्रतीक बन जाती है। जैसे किसी प्रिय व्यक्ति का चित्र मात्र कागज़ का टुकड़ा नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी भावनाओं का केंद्र होता है, वैसे ही भगवान की प्रतिमा साधक के लिए प्रेरणा और श्रद्धा का आधार बन जाती है।उन्होंने कहा कि भगवान की स्तुति में उनके रूप, वैभव, गुण अथवा चरित्र—किसी का भी वर्णन किया जाए, यदि उसके पीछे प्रेम और श्रद्धा है तो वह भक्ति ही है। प्रारंभ में साधक भगवान के बाहरी स्वरूप से आकर्षित होता है, फिर उनके गुणों की ओर बढ़ता है और अंततः उनके आत्मिक स्वरूप का चिंतन करने लगता है।मुनिश्री ने कहा कि साधना की पराकाष्ठा तब है जब साधक भगवान में जिन गुणों को देखता है, उन्हीं गुणों को अपने भीतर अनुभव करने लगता है। सच्ची भक्ति का अंतिम लक्ष्य भगवान से कुछ माँगना नहीं, बल्कि भगवान जैसे बनने की प्रेरणा प्राप्त करना है। जब भगवान की छवि में साधक अपनी आत्मा का स्वरूप देखने लगता है, तभी भक्ति निश्चय-स्तुति में परिवर्तित होकर आत्मानुभूति का मार्ग बन जाती है
गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
