दादा गुरुदेव आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज के समाधि दिवस पर मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज संघ ने दी भाव भीनी विनयांजली
विदिशा
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री 108 गरिष्ठसागर महाराज ने दादा गुरु आचार्य ज्ञानसागर महाराज के तप, त्याग और आध्यात्मिक प्रभाव का स्मरण किया। उन्होंने बताया कि आज से 53 वर्ष पूर्व, 1 जून 1973 को दादा गुरु ने इस नश्वर देह का त्याग कर सिद्धमार्ग की ओर प्रस्थान किया था।हालांकि तिथी से उस दिन ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या थी,
मुनिश्री ने कहा कि आचार्य ज्ञानसागर महाराज केवल एक संत नहीं, बल्कि ज्ञान और वैराग्य के ऐसे सूर्य थे जिनकी दिव्य आभा ने असंख्य आत्माओं को धर्ममार्ग की प्रेरणा दी। उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब ज्ञानरूपी सूर्य अस्त होने को था, तब एक विद्याधर के समान सेवाभावी महापुरुष मुनि विद्यासागर के रुप मेँ उनके जीवन में आए और उन्होंने ऐसी अद्वितीय सेवा की, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
मुनिश्री ने बताया कि राजस्थान की भीषण मई-जून की तपती गर्मी में,जहाँ रेत के कण भी अंगारों के समान प्रतीत होते हैं, वहाँ आचार्य गुरुदेव ने अपने गुरु के प्रति अनुपम श्रद्धा और समर्पण का परिचय दिया। दादा गुरु के मंगल विहार के दौरान उन्होंने लगभग चार किलोमीटर लंबी रेतीली नदी को पार कराने जैसी कठिन सेवाएँ संपन्न कीं। तपते वातावरण, कठिन परिस्थितियों और शारीरिक कष्टों की परवाह किए बिना की गई यह गुरुसेवा आज भी साधु जीवन की आदर्श मिसाल है।मुनि श्री गरिष्ठसागर महाराज ने आचार्य गुरुदेव और दादा गुरु से जुड़े अनेक प्रेरणादायी एवं अविश्वसनीय प्रसंग सुनाते हुए कहा कि गुरु-भक्ति, सेवा, समर्पण और त्याग का ऐसा उदाहरण विरले ही देखने को मिलता है। उनके जीवन के प्रसंग केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और साधना की प्रेरणा हैं।
आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज ने कभी उनको अकेला नहीँ छोडा अँतिम समय तक वह उनकी सेवा करते रहे और उसी सेवा का प्रतिफल है कि आज हम तीनों महाराज भी उन्हीं की कृपा पात्र के रूप में विदिशा नगर में धर्म की प्रवाहना कर रहे हैं
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने दादा गुरु के जीवन प्रसंगों को अत्यंत श्रद्धा और भाव-विभोर होकर सुना तथा उनके बताए आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। विदिशा नगर बासी बहूत ही सौभाग्य शाली है, जो उन्होँने इस युग के महासंत साक्षात महावीर के पाँच बार पूर्ण श्रद्धा के साथ दर्शन किये सन् 2002,2008,2014,2016, मेँ दो बार इस प्रकार आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का आना एवं जाना हुआ आज की इस समाधि दिवस पर आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज सहित तीन कम नौ करोड मुनिराजोँ को अर्घ समर्पित किये गये
प्रातः काल मुनि श्री उद्यमसागर महाराज ने दिगम्बर जैन मुनि परम्परा के अनुसार केशलोंच की।यह चर्या मुनि श्री द्वारा प्रत्येक तीन माह में की जाती है, जो वैराग्य, आत्मसंयम एवं परिषहजय का अनुपम उदाहरण है।
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि दिगम्बर जैन साधु अपने शरीर के प्रति ममता और आसक्ति का त्याग करते हुए स्वहस्त से केशों का लोचन करते हैं। केशलोंच केवल एक बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि आत्मसाधना, सहनशीलता और देह से अनासक्ति भाव का प्रतीक है। यह तप साधक के आत्मबल, त्याग, धैर्य और मोक्षमार्ग के प्रति समर्पण को अभिव्यक्त करता है।उन्होंने बताया कि केशलोंच के दिन मुनिश्री का उपवास भी रहा। कठोर तप और संयम से युक्त यह साधना दिगम्बर मुनि जीवन की विशिष्ट पहचान है, जो समाज को त्याग, तपस्या और आत्मकल्याण की प्रेरणा प्रदान करती है।इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के तप, त्याग और संयममय जीवन के प्रति अपनी गहन श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके मंगलमय आध्यात्मिक जीवन से प्रेरणा ग्रहण की।इस अवसर पर मुनि श्री हीरक सागर महाराज मंचासीन थे
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
