मनुष्य जीवन में धार्मिक कार्य श्री जी के दर्शन,अभिषेक,पूजन,स्वाध्याय तप से पुण्य अर्जित करे
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
जयपुर
गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति माताजी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु को सहित ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजित है। श्री चंद्र प्रभ जिनालय में आचार्य श्री के सानिध्य में भव्य पंचामृत अभिषेक शांतिधारा हुई।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि संसार की व्यवस्था कुछ विशेष द्रव्यों से चलती है। जीव,पुद्गल धर्म, अधर्म,आकाश और कालद्रव्य इनको समझे बिना संसार की व्यवस्था को ठीक से नहीं समझा जा सकता।धर्मद्रव्य किसी को चलने के लिए नहीं कहता। जैसे पानी मछली को तैरने में सहायता करता है, वैसे ही धर्मद्रव्य चलने वाले जीव और पुद्गल की सहायता करता है।अधर्मद्रव्य किसी को रोकता नहीं है। जैसे पेड़ की छाया थके हुए यात्री को बैठने में सहायता करती है, वैसे ही अधर्मद्रव्य ठहरने में सहायता करता हैं डा राजेश पंचोलिया,सुरेश सबलावत,भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि आकाश सबको स्थान देता है।यदि आकाश न हो तो हम, पक्षी,ग्रह-नक्षत्र और अन्य पदार्थ कहीं भी नहीं रह सकते।अनंत जीवों में मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। इसलिए इस जीवन को केवल खाने-पीने और भोग-विलास में नहीं गंवाना चाहिए।कोई जीव बड़ा हो या छोटा लेकिन महान वह है जिसके विचार अच्छे, पवित्र और करुणामय हैं। बुरे विचार भी पाप का कारण हैं गुरुदेव ने बताया कि हमेशा शुभ और कल्याणकारी विचार रखने चाहिए।आर्तध्यान रौद्र ध्यान से बचना चाहिए इनके कारण तीर्यच ओर नर्क गति मिलती हैं बार-बार चिंता करना, दुखी रहना, मोह में डूबे रहना यह आर्तध्यान है आर्तध्यान आत्मा को कमजोर बनाता है और अशुभ कर्मों का कारण बनता है। इसलिए ध्यान सबसे बड़ा तप है ध्यान मन को शांत करता है, कर्मों की निर्जरा करता है और आत्मा को शुद्ध बनाता है। प्रतिदिन थोड़ा समय ध्यान और स्वाध्याय के लिए अवश्य निकालना चाहिए।कोई बच्चा, कोई युवा या कोई वृद्ध मृत्यु किसी भी समय आ सकती है।इसलिए धर्म और अच्छे उपवास कार्यों को कभी कल पर नहीं टालना चाहिएअच्छा काम आज से अभी से ही प्रारंभ करें दर्शन ,अभिषेक , पूजा ,स्वाध्याय मंदिर जाएँ।धर्म करें।क्योंकि आने वाला समय किसी ने नहीं देखा। धन ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए है बड़ा घर, बड़ी गाड़ी और अधिक धन होना अच्छी बात हैलेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण और धर्म होना चाहिए।पुण्य से धर्म के अवसर मिलते हैं चौका लगाना,साधु-संतों की सेवा करना, मंदिर सेवा करना, दान देना ये सब पुण्य के उदय से ही संभव होते हैं।बच्चों को धर्म सिखाना, मंदिर ले जाना और गुरुजनों का सम्मान करना सिखाना माता-पिता का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।अपने जीवन में कम से कम एक ऐसा धर्मकार्य अवश्य करें जिससे धर्म की प्रभावना बढ़े और आत्मा को पुण्य का लाभ मिले।आज का मुख्य सूत्र शिक्षाएँ मनुष्य जन्म दुर्लभ है।अच्छे विचार रखो।चिंता छोड़ो, ध्यान करो धर्म को कल पर मत टालो। धन से अधिक महत्वपूर्ण धर्म है। परिवार में धर्म के संस्कार दो।आत्मकल्याण ही जीवन कावास्तविक लक्ष्य है।मनुष्य जन्म बड़ी कठिनाई सेमिला है। इसे केवल खाने, कमाने और सोने में मत बिताओ। थोड़ा समय धर्म, ध्यान, स्वाध्याय और आत्मकल्याण के लिए भी निकालो। यही जीवन की सच्ची सफलता है।
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
