आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कमल के समान खिलना सीखो महकना सीखो दीपक की तरह प्रकाशमान बनो मिश्री की तरह मीठे बनो

धर्म

आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कमल के समान खिलना सीखो महकना सीखो दीपक की तरह प्रकाशमान बनो मिश्री की तरह मीठे बनो
उज्जैन
उज्जैन नगरी में विराजित परम पूज्य आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर महाराज ने प्रसन्न रहने की बात की ऐसे कार्य करने की बात कही जिससे देश धर्म व संस्कृति का उत्थान हो। आचार्य श्री ने कहा कि एक उन्नत उद्योधित प्रकाशित दीपक हजारों दीपकों को प्रकाशमान कर देता है। शहर के मध्य सरोवर में खिला एक पुष्प अनेकों कोप्रफुल्लित करता है। एक जिन प्रतिमा अनेक भक्तों को आनंदित करती है,

 

सूर्य की एक किरण अंधकार का क्षय कर देती है। हमेशाप्रसन्न रहो, प्रसन्नचित्त चेहरा सभीको आनंदित करता है। ऐसे कार्यकरो जिससे देश, धर्म एवं संस्कृति का उत्थान हो।उन्होंने कहा कमल के समान खिलना सीखो, महकना सीखो। दीपकी तरह प्रकाशमान बनो। चंदन के समान सुगंधित बनो। मिश्री की भांति मीठे बनो।

 

आचार्य श्री ने कहा आचार्यश्री ने कहा की बांस से ही लाठी बनतीहै और बांस से ही मधुर बांसुरी बनती है। किसी का सिर फूट जाए ऐसी लाठी मत बनो, अपितु मधुर,मनभावन ध्वनि देने वाली बांसुरी बनो। कौआ भी काला होता है,कोयल भी काली होती है, उनकी पहचान आवाज से हो जाती है।हमारी वाणी बाण की तरह न चुभे,अपितु बांसुरी की तरह मधुर हो।हमारा व्यवहार  मिलनसार मधुर होना चाहिए

 

वाणी की मधुरता जन-जनका प्रिय बना देती है। संग्राम नहीं,  समझौता करना भी सीखो। समय केताव के अनुसार जीवन जीना सीखो। विष नहीं, अमृत बनो। कैंची नहीं, सुई बनो। शूल नहीं फूल बनो।

आचार्य श्री ने कहा कि उन्नति के लिए दृष्टि का महत्व समझना चाहिएव्यक्ति की दृष्टि विशाल, पवित्र एवं दूरवर्ती होना चाहिए। दूरदृष्ट्यअपने अनुमान ज्ञान से आगत संकटों को पहले से ज्ञात कर संकटों सेबच जाता है। एक कुंभकार मिट्टी में मटका देखता है और शीतलप्रतिमा निहारता है, ग्वालिन दुग्ध में घृत देख लेती है, वैसे ही सच्चाजल करने वाला कुंभ निर्मित कर धन कमाता है। शिल्पकार पाषाण में साधक आत्मा में परमात्मा को निहारता है और तप त्याग कर सिद्धिप्राप्त करता है। हर कार्य में दृष्टि का महत्व है। जीवन में उन्नति केलिए दृष्टि का महत्व समझकाम, क्रोध, मान, माया, राग-द्वेष की गर्मी से बचोबाहर की गर्मी से फल सड़ जाते हैं, ऐसे ही कषाय की गर्मी सेआत्मा विकृत हो जाती है। अपने आपको काम, क्रोध, मान, माया,राग-द्वेष, ईर्ष्या की गर्मी से बचाओ। फल सड़ गया तो फेंक दोगे पर यदि शरीर सड़ गया तो भव-भव में भ्रमण कर कष्ट भोगना पड़ेगा।

 

मन को बिगड़ने से बचाओ, तन को सड़ने से बचाना है तो
शाकाहार करो, अल्प बोलो, अति से बचो तन से धुआं निकले
उसके पहले कषायों को छोड़ दो। राख होने वाले पर राग मत करो। स्वयं  को संभालो, आत्म के विशुद्ध परिणामों की रक्षा करो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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