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आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का हुआ कैशलोचन शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र संस्कार और व्यक्तित्व का निर्माण करती है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज

धर्म

आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का हुआ कैशलोचन शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र संस्कार और व्यक्तित्व का निर्माण करती है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
शामली
आज दिगंबर जैन धर्मशाला में प्रवचन करते हुए वाक्ककेसरी संत आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महा मुनिराज ने कहा कि शिक्षा, संस्कार और आत्मसंयम से ही जीवन का वास्तविक विकास है।

 

महाराज श्री ने कहा आज के आधुनिक युग में शिक्षा को जीवन की सफलता का प्रमुख आधार माना जाता है। प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि उनके बच्चे शिक्षित होकर उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करें। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र, संस्कार और व्यक्तित्व का भी निर्माण करती है। इसलिए बेटा और बेटी दोनों को समान अवसर देकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना समय की आवश्यकता है।
प्राचीन काल में शिक्षा प्राप्त करना सरल नहीं था। विद्यार्थियों को घर-परिवार से दूर रहकर अध्ययन करना पड़ता था। उस समय शिक्षा के साथ अनुशासन, नैतिकता और जीवन मूल्यों पर विशेष बल दिया जाता था। यही कारण था कि शिक्षा व्यक्ति को केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि संस्कारित और जिम्मेदार नागरिक भी बनाती थी। Advertisement poster for namkeen snacks featuring bowls of fried snacks and contact numbers, with Hindi text in the background.

मनुष्य का जीवन उसकी संगति, विचारों और व्यवहार से प्रभावित होता है। अच्छी संगति व्यक्ति को उन्नति के मार्ग पर ले जाती है, जबकि गलत संगति उसे पतन की ओर धकेल सकती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को विवेकपूर्ण जीवन जीते हुए अच्छे विचारों और श्रेष्ठ व्यक्तियों का साथ ग्रहण करना चाहिए।

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महाराज श्री ने कहा प्रेम, विश्वास और आपसी समझ से ही परिवार तथा समाज में सद्भाव बना रहता है। भारतीय संस्कृति का मूल आधार शुद्ध विचार, संयम और सदाचार है। संस्कृति केवल बाहरी परंपराओं का पालन करने का नाम नहीं, बल्कि जीवन में नैतिक मूल्यों को अपनाने का नाम है। जब मनुष्य अपने विचारों को पवित्र बनाता है, तब उसका जीवन भी श्रेष्ठ बनता है। संसार की भौतिक वस्तुएँ क्षणिक हैं, जबकि आत्मिक उन्नति और चरित्र की संपदा स्थायी होती है।

 

जीवन में सफलता और शांति का सबसे महत्वपूर्ण आधार मन पर नियंत्रण है।

महाराज श्री ने जीवन की सफलता के विषय में बताया और कहा कि
जीवन में सफलता और शांति का सबसे महत्वपूर्ण आधार मन पर नियंत्रण है। मनुष्य के सुख-दुःख का कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसका मन है। यदि मन संयमित और सकारात्मक हो तो कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति संतुलित रह सकता है। धार्मिक स्थल, सत्संग और गुरुजनों का सान्निध्य मन को सही दिशा देने का कार्य करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के साथ संस्कार, आत्मचिंतन, संयम और नैतिक मूल्यों को भी महत्व दिया जाए। जब शिक्षा, संस्कृति और आत्मसंयम का समन्वय होगा, तभी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वास्तविक विकास संभव हो सकेगा।

महाराज श्री ने किया केशलोच
आज प्रातः कालीन बेला में परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विनिश्चय सागर जी महा मुनिराज ने कर्मो की निर्जरा हेतु अपना स्वयं केशलोच किया, कल शाम शामली के भक्तों को सरूरपुर में होने वाले पंच कल्याणक में भगवान के माता पिता बने पात्रों की गोद भराई करने का अवसर प्राप्त हुआ।

प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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